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संशोधित मिथिलादेशीय अपात्रक श्राद्ध पद्धति – “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं”

संशोधित मिथिलादेशीय अपात्रक श्राद्ध पद्धति - "सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं"

“सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” केवल एक कर्मकाण्ड पद्धति नहीं, अपितु विकृत हो चुके श्राद्ध विज्ञान का शास्त्रीय सम्मार्जन (शुद्धिकरण) है। महामहोपाध्याय रुद्रधर झा कृत ‘श्राद्ध विवेक’ (१४वीं शताब्दी) तथा महामहोपाध्याय वाचस्पति मिश्र (१५वीं शताब्दी) की परम्परा का अनुगमन करते हुए यह ग्रन्थ प्रमाणित करता है कि पात्रता और प्रतिग्रहाधिकार के ह्रास के कारण वर्त्तमान में पूर्णतः अपात्रक श्राद्ध विधि ही एकमात्र निर्दोष मार्ग है।

संशोधित मिथिलादेशीय अपात्रक श्राद्ध पद्धति – “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं”

आद्यश्राद्ध (एकादशाह) में काल-मर्यादा (मध्याह्न), द्वादशाह को १४/१५ मासिक श्राद्धों का ‘तन्त्र’ (एक साथ) अनुष्ठान, सपिण्डीकरण में प्रेतवेदी व पितृवेदी का अनिवार्य पृथक्करण, सांवत्सरिक क्षयाह श्राद्ध में महापात्र का पूर्ण निषेध तथा — ये सभी संशोधन इस बात के साक्षी हैं कि कालानुकूल परिष्करण का जो मार्ग पूर्वाचार्यों ने आरम्भ किया था, वह अवरुद्ध नहीं हुआ है।

लोकाचार के नाम पर शास्त्र की हत्या करने वाले ‘शास्त्रदस्यु मूर्खाचार्यों’ का दर्पदलन करती यह पद्धति पितरों की क्षुधा-तृषा का वास्तविक निवारण है जो उनकी जिसके वो तृप्ति प्राप्त करेंगे और तृप्त होने पर अपने वंशजों को आशीर्वाद प्रदान करेंगे।

वाचस्पत्यं मतं दिव्यं रुद्रधरीय-दीपकम्। तयोः परम्पराशुद्धं ग्रन्थेऽस्मिन्परिकीर्तितम् ॥
पात्रतारहिते विप्रे कलिदोषसमन्विते। अपात्रकविधानेन श्राद्धं सर्वं सुसिद्ध्यति ॥
शास्त्रतत्वमविज्ञाय लोकाचाररताः खलाः। विकृतं चक्रिरे सर्वं श्राद्धकर्म कलौयुगे ॥
कलिदोषान्वितं वीक्ष्य पात्रतापरिकर्षणम्। विशुद्धाऽपात्रकंमार्गं वाचस्पत्यं प्रतिष्ठितम् ॥

मध्याह्नवेलासम्प्राप्तं कुतुपं स्वधाभवनम्। एकोद्दिष्टस्य कालः स्यात्सायाह्ने निष्फलं भवेत् ॥
एकोद्दिष्टं च मध्याह्ने कुतुपे स्वधाभवने। सायाह्न-श्राद्ध-हन्तारं शास्त्रदस्युं निवारयेत् ॥
अपकृष्टमासिकानां तन्त्रमेव सुशोभनम्। पृथक्त्वे काललोपः स्यात्तस्मात्तन्त्रं समाचरेत् ॥
प्रेत-वेदी भवेद् भिन्ना पितृ-वेद्याः प्रयत्नतः। देवः पूर्व दिशाभागे प्रेतः पश्चिमतः स्थितः ॥

पितृकर्म क्षयाहाख्यं सांवत्सरिकपावनम्। प्रेतभागी विना कार्यं पुरोधा तत्र पूजितः ॥
पितॄणां तृप्तिदं मार्गं सुसिद्धं विधिवच्छ्रुतम्। दिगम्बरेण ग्रथितं ग्रन्थं मोक्षप्रदं नृणाम् ॥

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अस्वीकरण: इस युगान्तरकारी श्राद्ध पद्धति के विश्लेषण और भूमिका आदि में प्रयुक्त कटु शब्द (मूर्खाचार्य, धूर्ताचार्य, शास्त्रदस्यु, मूर्खाधिराज) किसी व्यक्ति, संस्था या सामान्य पुरोहित वर्ग के प्रति व्यक्तिगत द्वेष से प्रेरित नहीं हैं, बल्कि महाभारत के शांतिपर्व के अनुसार शास्त्रों की अवहेलना करने वाली ‘बौद्धिक जड़ता’ के प्रति ‘तिक्त ओषधि’ (कड़वी दवा) हैं।

यह प्रथम संस्करण (गंगादशहरा सम्वत् २०८३ / २६-०५-२०२६) केवल विद्वज्जनों के मध्य शास्त्रार्थ, समालोचना और प्रामाणिक खण्डन-मण्डन हेतु निर्गत किया गया है; रक्षाबन्धन सम्वत् २०८३ तक प्राप्त सुझावों के उपरान्त ही इसका व्यावहारिक संशोधित रूप प्रस्तुत किया जायेगा। विधान व मंत्रादि के अतिरिक्त इस ग्रन्थ के मौलिक वैचारिक विश्लेषण और संयोजन पर लेखक का वैधानिक बौद्धिक सम्पदा (कॉपीराइट) अधिकार पूर्णतः सुरक्षित है।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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