आसन्न संकट और मार्ग; भाग – १

आसन्न संकट और मार्ग; भाग - १

“द्विज के लिए दीक्षा (सावित्री दीक्षा) उपनयन में ही निहित है, कान फुंकवाने की व्यावसायिक प्रथा में नहीं।”

मानव सभ्यता पर एक गंभीर संकट आसन्न है और ये विज्ञान को भी ज्ञात है, किन्तु उसके समक्ष किंकर्तव्यविमूढ़ वाली स्थिति है, उसे मार्ग मिल ही नहीं सकता क्योंकि विवेक नष्ट हो चुका है। भारत में वेद हैं, शास्त्र हैं और विवेक का प्राकट्य वेद-शास्त्रों से ही होता है। “धर्मशास्त्र रथारूढा वेदखङ्गधरा द्विजाः । क्रीडार्थमपि यद्ब्रूयुः स धर्मः परमः स्मृतः ॥” बौधायन स्मृति, लघु शातातप स्मृति, स्कन्द पुराण आदि में इस प्रकार वर्णित है। ब्राह्मण इसीलिये क्योंकि वह विवेकवान् होते हैं जो वेद-शास्त्रों से प्राप्त होता है। आसन्न संकट का समाधान भी ब्राह्मण के विवेक से ही जो मार्ग प्राप्त होगा उसमें ही संभव है अन्य किसी प्रकार नहीं।

आसन्न संकट और मार्ग; भाग – १

“सेवक का स्वामित्व भाव ही प्रकृति को नियंत्रित करने की धृष्टता करता है, जिससे प्रलय सुनिश्चित होता है।”

शास्त्रीय तथ्य यही है कि भारत कर्मभूमि है जहां मुक्ति संभव है एवं अन्यान्य भूमि भोगभूमि है जहां आत्मकल्याण की कल्पना भी असंभव है। विगत शताब्दि की बात करें और मुख्य रूप से २-३ दशकों की तो यह स्पष्ट होता है कि आसुरी प्रवृत्ति ने विकास नामक संज्ञा धारण करके कर्मभूमि भारत को भी विनाश के दलदल में झोंक दिया है। इसकी द्रुतगति से ही इसका आसुरी होना स्पष्ट हो जाता है। वर्तमान में विश्व लोकतंत्र नामक अराजक व्यवस्था इस प्रकार ग्रसित है कि प्रतीत होता है संभवतः कलयुग ने ही लोकतंत्र का रूप धारण कर रखा है।

प्रकृति को नियंत्रित करने की धृष्टता
प्रकृति को नियंत्रित करने की धृष्टता

लोकतंत्र और द्रुतगामी विकास का संयोग ऐसा है कि जल-थल-नभ-ग्रह-नक्षत्र सर्वत्र मानवीय प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है। भारत भी पीछे नहीं है क्योंकि यहां भी लोकतंत्र और विकास का संयोग है। प्रकृति का अनुग्रह प्राप्त नहीं किया जा रहा है अपितु नियंत्रित करने की चेष्टा की जा रही है और यही वो विषय है जहां सेवक का स्वामित्व भाव प्रकट होता है एवं गंभीर दुष्परिणाम को निमंत्रित किया गया है जो पूरी मानव सभ्यता के लिये ही संकट उत्पन्न कर चुका है और प्रलय जैसा कुछ संभावित कर रहा है।

मानव के लिये आध्यात्मिक परम लक्ष्य मोक्ष-शांति है और सांसारिक लक्ष्य सुख प्राप्ति है किन्तु दिग्भ्रमित हो सुख के स्थान पर सुविधा को प्रतिष्ठित कर दिया गया है जिसका दुष्परिणाम यह है कि जितनी अधिक सुविधा है उतना ही सुख का अभाव भी । एक सामान्य व्यक्ति कठिन परिश्रम करके भी सुखी है, यदि चिंतित है तो धनाभाव व इस कारण सुविधा के अभाव से किन्तु एक धनाढ्य व्यक्ति के पास सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं सुख के अतिरिक्त । एक धनाढ्य व्यक्ति अनेकानेक चिंताओं से ग्रस्त है, दाम्पत्य सुख तक का भी अभाव है सुविधा जितनी हो ।

जिस विषय का चिंतन आरम्भ किया गया है वास्तव में मैं उसकी अर्हता धारण नहीं करता हूं किन्तु समस्या यह है कि जो समर्थ हैं वो प्रसिद्धि-अनुयायी-धन आदि के लिये ही व्यग्र हैं ऐसे विषयों पर चर्चा करने में रूचि का भी अभाव होता है। दैवकृपा से मुझे विद्यावारिधि आचार्य दीनदयाल मणि त्रिपाठी जी का प्रातिभासिक सान्निध्य प्राप्त है और संवाद-मार्गदर्शन आदि लब्ध है। इस विषय के मूल में जो मुख्य विषय है उसके लिये आग्रह से दीक्षा तत्व पर विचार व विश्लेषण (आचार्य दीनदयाल मणि त्रिपाठी) कर रहे हैं। उद्देश्य जनकल्याण की ओषधि प्राप्ति है ।

हमें ऐसा पूर्व विश्वास है कि वर्त्तमान काल में जो दीक्षा विषयक भ्रांतियां हैं उनका उन्मूलन होगा और आत्मकल्याण व आसन्न संकट के निवारण का मार्ग प्रशस्त होगा। हमें जो भी प्राप्त हो रहा है उनकी आज्ञा के बिना प्रस्तुत नहीं किया जा सकेगा।

विद्यावारिधि आचार्य दीनदयाल मणि त्रिपाठी
विद्यावारिधि आचार्य दीनदयाल मणि त्रिपाठी

उपरोक्त विश्लेषण से यह सिद्ध हो रहा है कि संकट आसन्न है और आग लगने से पूर्व कूपखनन हो जाये तो बुझाने की संभावना रहेगी। प्रकृति के रौद्र रूप का दर्शन असाध्य आधि-व्याधि आदि रूप में होगा जहां मनुष्य भोजन में केवल “मेडिसीन” ग्रहण करके भी पीड़ित और व्यग्र ही रहेगा अर्थात् वर्तमान में जितना भी लाभ प्राप्त कर रहा है उतना भी प्राप्त नहीं कर पायेगा।

वर्तमान में एक-दो समस्या की गोली नित्य किया गया है आगे जो भी समस्या होगी सबकी गोली नित्य होती जायेगी, पृथ्वी अन्न भक्षण करने लगेगी अर्थात् अन्न नहीं उपजेगा और अन्यान्य जीवों के मांस की क्या बात करें मनुष्य मनुष्य का भी भक्षण आरम्भ कर देगा (ये एप्सटीन फाइल वाली घटना से भिन्न स्थिति है) और कारण बस वही कि लोकतंत्र और विकास का ऐसा समागम । ये सामान्य अवस्था है जहां पंचतत्व प्रत्यक्ष कोप प्रकट न करें, प्रत्यक्ष कोप कुछ और भी होगा ।

प्रकृति किस-किस प्रकार से दण्डित करेगी इसका संकेत मात्र ही अनुमान है। सम्प्रति भारत में सदाचारी भी हैं किन्तु अत्यल्प, अधिकांशतः पथभ्रष्ट ही हैं और इसका कारण मुख्य कारण कलयुग का प्रभाव ही है जिससे शासन व्यवस्था, जीवनशैली, मनन शक्ति आदि प्रभावित है।

मनुष्यजीवन (द्विजाति) में धर्मकाण्ड का आरम्भ उपनयन और सावित्री दीक्षा से होता है जो कर्मकाण्ड के नाम से जाना जाता है। इसमें नित्य, नैमित्तिक और काम्य कर्म आते हैं, काम्य कर्म तो पर्याप्त किये जाते हैं, नैमित्तिक कर्म प्रतीकात्मक स्वरूप में हैं और नित्यकर्म लुप्तप्राय होता जा रहा है। नित्यकर्म क्या सामान्य शौचाचार भी लुप्त होता जा रहा है एवं यहां से एक नये विषय का उदय होता है “दीक्षा” संज्ञक।

वर्त्तमान में सामान्यतः किसी के मुंह से भी यह कहते-सुनते देखा जा सकता है कि यदि सिख न हुआ तो सारा धर्म-कर्म निष्फल होता है अथवा इसी प्रकार के भाव वाला। यहां दीक्षा के लिये ही सिख शब्द अथवा अन्यान्य शब्द जैसे “कान फुंकवाना” आदि भी प्रयुक्त होता है। द्विजाति के लिये यह विचार तो है ही उसमें भी मुख्य रूप से ब्राह्मण के लिये अधिक आवश्यक है।

दीक्षा विमर्श

सामान्य गृहस्थ हेतु यह ज्ञातव्य है कि उसकी दीक्षा (सावित्री दीक्षा) उपनयन में ही होने के कारण वहीं से दीक्षित मर्यादा का पालन आवश्यक होता है। दीक्षाप्राप्तिपूर्वक ब्रह्मचर्याश्रम प्रविष्ट हो दीक्षित विधान मर्यादित जीवनचर्या निर्वहन करते हुये समावर्तन से ब्रह्मचर्याश्रमविलोप किया जाता है। जब तक विवाह न कर ले तब तक गृहस्थाश्रमी न होकर अनाश्रमी संज्ञत होता है एवं विवाहोपरांत गृहस्थाश्रमी होता है व पूर्व दीक्षित होने से उन मर्यादाओं का पालन अपेक्षित होता है। तथापि वर्त्तमान काल में दीक्षित मर्यादा/सदाचार सर्वथा विलुप्तप्राय होने के कारण व पापप्रवृत्तिवशात् कर्माधिकार से च्युत हो जाता है।

उक्त परिस्थिति में भी कर्मलोप न होवे इस व्यवस्था हेतु प्रायश्चित्त पूर्वक कर्माधिकार प्राप्ति विधान है। प्रायश्चित्ताभाव में प्रत्याम्नाय (गोदान) और गोदानाभाव में गोनिष्क्रय विकल्प प्राप्त होता है। अस्तु इस व्यवस्था का मूल तात्पर्य कर्मविशेष की सिद्धि होना मात्र है। यहीं पर पुनर्दीक्षा की आवश्यकता प्रतीत होती है और पुनर्दीक्षा में पुनरुपनयन हो यह प्रथम पक्ष है किन्तु इस मर्यादा/सदाचार का पालन कलयुगबाधावश दुष्कर होने से अन्यान्य सरल विधान सम्प्रदाय परक उत्कृष्ट सिद्ध होता है।

सावित्रीदीक्षित सम्प्रदाय से परे (उत्कृष्ट) होता है अर्थात सर्वसम्प्रदाय में अधिकृत अर्थात गाणपत्य, शाक्त, वैष्णव, शैव, सौर, स्कान्द यथायोग्य विहित। कठिन मर्यादा/सदाचार वश पुनः प्रतिष्ठा न होने से आत्मकल्याण में विघ्नसिद्धि होती है एवं विघ्न निवारण हेतु सम्प्रदायविशेषचयन सरल सदाचारादि युक्त प्रतीत होने से ग्राह्य विकल्प सिद्ध होता है। किन्तु ध्यातव्य यह है कि यदि भ्रष्ट होकर सम्प्रदाय विशेष की दीक्षाग्रहण करे तो सर्वप्रथम उसको जाने-समझे और पालनीय है अर्थात पालन करेंगे ऐसी प्रतिज्ञापूर्वक ही दीक्षा का मार्ग संभव है जो अदृष्ट है।

दीक्षा के विषय में (दीक्षादाता व दीक्षा प्राप्ति करने वाला दोनों द्वारा) एक पंक्ति प्रयुक्त की जाती है “बिना दीक्षा के सभी कर्म निष्फल होते हैं” यह सर्वथा अनुपयुक्त प्रयोग है। दिक्षारहित का कर्म निष्फल होता है किन्तु इसका प्रयोग यहां इस प्रकार निरर्थक है, यह उक्त दीक्षा को अनिवार्य सिद्ध करने के लिये प्रयोग किया जाता है इस कारण से।

सावित्री दीक्षित यदि सदाचार पालन करे तो वह दीक्षित ही होता है अदीक्षित नहीं एवं वेदोक्त मार्ग का अधिकारी होता है, उसे अन्य दीक्षा की आवश्यकता ही नहीं होती है अपितु यदि सदाचार में स्थित होकर अन्य दीक्षा ग्रहण करे तो अधोगामी ही सिद्ध होता है। कर्म के निष्फल होने में दीक्षा का तात्पर्य जिस कर्म प्रवृत्त हो उस कर्म के लिये दीक्षित होना है न कि कान फुंकवाना।

सावित्रीदीक्षा भंग होने से पुनः कठिनमार्ग में सक्षम न होना (सकारण-अकारण वा) पुनः प्रतिष्ठा न करके सरल मार्ग सम्प्रदाय प्रतिष्ठा से उसकी मर्यादा का पालन अनिवार्य होता है। यदि कान फुंकवा ही ले किन्तु मर्यादा से रहित रहे तो पुनः अप्रतिष्ठित उसी सिद्धांत से हो जाता है जैसे सावित्री दीक्षा भंग होती है। अस्तु निष्कर्षतः यदि यह प्रतीत हो कि दीक्षा (सम्प्रदाय) की अपेक्षित है तो उस सम्प्रदाय (जिसमें दीक्षित होना चाहे) की मर्यादाओं को प्रथम ज्ञात करे और पालन किया जायेगा ऐसा दृढप्रतिज्ञ होकर ही दीक्षित होवे एवं दीक्षोपरांत मर्यादा/सदाचार को प्रतिष्ठित रखे।

यह विकल्प है और विकल्प श्रेष्ठ नहीं होता। प्रथम कल्प में पुरुपनयन ही शास्त्रीय विधान है किन्तु यदि इसको प्रतिष्ठित रखने में अक्षम हो तो विकल्प चयन का अवसर होता है। विकल्प ग्रहण करने वाला सावित्री दीक्षित से श्रेष्ठ होता है ऐसा अहंकार पालन न करे। रामार्चा में वैष्णव ब्राह्मण, शिव पूजा में शैव आदि की चर्चा जहां है वहां प्रथम अधिकारी सावित्रीदीक्षित के अभाव में वैकल्पिक है न कि श्रेष्ठ। श्रेष्ठ सावित्री दीक्षित ही होता है एवं सर्वाधिकारी होता है।

विकल्प में जो रामार्चा हेतु वैष्णव, शिव पूजन में शैव ब्राह्मण आदि के ग्रहण का जो पक्ष है वो सर्वथा अभाव में इस कारण है कि सम्प्रदाय भेद न हो। सम्प्रदाय में अधिष्ठित व्यक्ति स्वसम्प्रदाय मात्र के लिये अधिकृत हो सकता है अन्य सम्प्रदाय के लिये नहीं।

अस्तु द्विज हेतु विशेषकर ब्राह्मण के लिये यदि अप्रतिष्ठित भी हो तो यह अपेक्षित है कि पुरुपनयन विधान से पुनः प्रतिष्ठित होकर सर्वाधिकार को सुरक्षित करे न कि सम्प्रदाय विशेष मात्र में अधिष्ठित हो। किन्तु पुनरुपनय से पूर्व दीक्षित विधान/सदाचार आदि को सम्यक् प्रकार से ज्ञात कर ले क्योंकि आगे पालनीय होगा तभी प्रतिष्ठित रह सकता है तदनन्तर दृढ़प्रतिज्ञ होकर पुनरुपनयन पूर्वक पुनः प्रतिष्ठित होवे।

ऐसा ब्राह्मण सर्वाधिकार से युक्त होगा। किन्तु इससे यह भी सिद्धि हो रही है कि सम्प्रदाय विशेष को ग्रहण करने वाला ब्राह्मण भिन्न सम्प्रदाय हेतु श्रेष्ठ नहीं होता इसी कारण देवता के अनुसार सम्प्रदाय संबंधी ब्राह्मण के चयन की विशेषता कही गयी है एवं उसके अभाव में अन्य सम्प्रदाय के ब्राह्मण का भी विकल्प रहेगा ही क्योंकि विकल्प अवरुद्ध होने से कर्मलोप होगा। यथा शिवपूजन में प्रथम पक्ष शैव ब्राह्मण ही होगा (सवित्रीप्रतिष्ठित का अभाव होने पर) किन्तु यदि शैव ब्राह्मण उपलब्ध ही न हो तो जो संकट वर्त्तमान में उपस्थित भी है, विकल्प में वहां वैष्णवादि अन्य सम्प्रदाय में प्रतिष्ठित ब्राह्मण भी ग्राह्य होगा।

दीक्षा विमर्श
दीक्षा विमर्श

यह नितांत आवश्यक है कि “कान-फुंकवाना” और “कर्म की निष्फलता” के सिद्धांत का परित्याग करे क्योंकि जिसने ऐसा किया और वहां भी प्रतिष्ठित न रहा अर्थात च्युत हो गया वह तो अधोगामी हो गया, पतनोन्मुखी हो गया।

अब प्रश्न ऐसे ब्राह्मणों का आएगा जो किसी किसी संप्रदाय विशेष में प्रवेश कर चुके हैं उनके लिये क्या वेदमार्ग में पुनः प्रतिष्ठा का मार्ग अवरुद्ध है अथवा खुला है और पुनः प्रतिष्ठित हो सकते हैं अथवा नहीं ?

यद्यपि यह (पुरुपनय विधान पूर्वक प्रतिष्ठा) प्रामाणिक पक्ष है किन्तु जो निबंध है वह निष्कर्ष रूप में प्रस्तुत किया गया है अस्तु यथावत प्रमाण उपलब्ध नहीं हो सकता तथापि शास्त्र सिद्धि हो सकती है। किन्तु यदि ऐसा ब्राह्मण जिसका पतन हो चुका है और सम्प्रदाय विशेष में संकीर्णता प्राप्त कर चुका है उसके लिये पुनः प्रतिष्ठा का मार्ग क्या है, विधान क्या होगा इसमें अनेकानेक विषय और जुड़ेंगे। जैसे व्रात्य हेतु नहीं होगा अर्थात व्रात्य जिस संप्रदाय में प्रतिष्ठित हुआ है उसी में स्थित रहे किन्तु शाखारण्ड हेतु विधान है।

इस प्रकार के अन्य सम्बंधित अनेकानेक पक्षों को भी स्पष्ट करते हुये ही सम्प्रदाय विशेष में स्थित ब्राह्मण हेतु पुनः प्रतिष्ठा का विश्लेषण संभव है। ब्राह्मणेत्तरों के लिये सर्वथा कठिन है, किन्तु यदि ब्राह्मणेत्तर द्विजाति भी वेदमार्ग में अधिष्ठित होना चाहे तो उसका भी योग्यतानुसार विधान यथावत (लगभग) ही होगा। यह सन्देश महत्वपूर्ण नहीं विशेष महत्वपूर्ण है एवं इसका जहां तक संभव हो प्रचार-प्रसार करना चाहिये जिससे जो ब्राह्मण संकीर्णता को प्राप्त कर चुके हैं वो निवारण करना चाहें तो कर सकें।

यहां केन्द्रबिन्दु से विमर्श का आरम्भ मात्र किया गया है इस केन्द्रबिन्दु का परिष्कार किये बिना धर्म की स्थापना संभव नहीं है और धर्म की स्थापना किये बिना विनाश सुनिश्चित है, ये विनाश मानव सभ्यता का होगा। इसमें दीक्षा प्रदान करने वाले को कौन नियंत्रित करे, दीक्षा ग्रहण करने वाले को ही सावधान होना होगा, जागरूक होना पड़ेगा। स्वधर्म में निष्ठ होकर पालन करने के दिशा में प्रयत्नशील होना होगा। यह चर्चा आगे भी क्रमशः यथाकाल होती रहेगी।

निष्कर्ष

“ब्राह्मण का विवेक और मार्गदर्शन ही मानव सभ्यता को इस आसन्न महाविनाश के दलदल से बाहर निकाल सकता है।”

इस गम्भीर विमर्श का मूल निष्कर्ष यह है कि मानव सभ्यता पर आसन्न प्रलयंकारी संकट और प्रकृति के रौद्र कोप का मुख्य कारण सनातन की ‘शास्त्रीय मर्यादाओं’ और ‘नित्याचार’ का लोप करके आधुनिक विकास और ‘लोकतंत्र रूपी अराजक व्यवस्था’ को अंगीकार करना है। इस व्यवस्था का दुष्परिणाम यह है कि कर्मभूमि भारत में ब्राह्मण उत्पीड़ित हो रहे हैं और उत्पीड़कों को केवल भारतीय व्यवस्था से ही नहीं वैश्विक व्यवस्था से भी संरक्षण कर समर्थन प्राप्त है, ये अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारना है।

इस संकट का जिसे भी आभास हो वह इसके समाधान को भी समझ ले, इसका समाधान भारत में धर्म की स्थापना हो इसी में सन्निहित है। इसका मूल दीक्षा में निहित है और सर्वप्रथम दीक्षा का परिष्करण अपेक्षित है। इस विमर्श का यहां समापन नहीं किया गया है अपितु आरम्भ किया गया है। भारत ही नहीं अखिल विश्व इस बात की गांठ बांध ले कि उसके अस्तित्व का संरक्षण भारतीय ब्राह्मणों की स्वधर्म में स्थिति से होगी। जिसके अधीन तुम्हारा अस्तित्व है उसका समापन करने में तुम समर्थ ही नहीं हो किन्तु शरणागत न होने पर स्वयं ही नष्ट हो जाओगे।

F&Q :

FAQ

प्रश्न १: मानव सभ्यता पर आसन्न संकट का मूल कारण क्या है?

उत्तर: मूल कारण है ‘प्रकृति पर प्रभुत्व स्थापित करने का आसुरी प्रयास’। लोकतंत्र और द्रुतगामी विकास के संयोग से मनुष्य जल-थल-नभ को नियंत्रित करने की चेष्टा कर रहा है, जिससे प्रकृति का संतुलन नष्ट हो गया है और प्रलय जैसी स्थितियाँ बन रही हैं।

प्रश्न २: “सुविधा और सुख” के विषय में लेखक का क्या शास्त्रीय दृष्टिकोण है?

उत्तर: आधुनिक युग में मनुष्य ने सुख के स्थान पर ‘सुविधा’ को प्रतिष्ठित कर दिया है। परिणाम यह है कि सभी भौतिक सुविधाएं उपलब्ध होने के बाद भी धनाढ्य वर्ग मानसिक चिंताओं और दाम्पत्य सुख के अभाव से ग्रसित है, जबकि कठिन परिश्रम करने वाला निर्धन सुखी है।

प्रश्न ३: यदि उपनयन की सावित्री दीक्षा कलयुग के प्रभाववश भंग हो जाए, तो शास्त्रसम्मत प्रथम कल्प क्या है?

उत्तर: शास्त्रों के अनुसार, यदि सदाचार भंग होने से कर्माधिकार लुप्त हो जाए, तो ‘पुनरुपनयन’ (पुनः जनेऊ संस्कार) कराकर वेदमार्ग में पुनः प्रतिष्ठित होना ही एकमात्र मुख्य शास्त्रीय विधान है।

प्रश्न ४: क्या सम्प्रदाय विशेष में दीक्षित ब्राह्मण सर्वाधिकारी होता है?

उत्तर: नहीं। सम्प्रदाय विशेष (जैसे शैव, वैष्णव, शाक्त) में दीक्षित ब्राह्मण केवल अपने सम्प्रदाय के कार्यों के लिए अधिकृत होता है। इसके विपरीत, सावित्री-प्रतिष्ठित (शुद्ध वेदमार्गी) ब्राह्मण समस्त सम्प्रदायों का अधिपति और सर्वाधिकारी होता है।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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