अर्घ्य स्थापन विधि
सामान्यार्घ स्थापन : अपने दक्षिणभाग में जल छिड़ककर रक्तचन्दन, सिंदूर, कुङ्कुमादि से एक चतुर्भुज बनाएं उस चतुर्भुज के भीतर एक त्रिभुज बनाएं और ॐ आधारशक्तये नमः मंत्र से पञ्चोपचार पूजन कर लें । तत्पश्चात् स्वस्तिकादि बनाया हुआ अर्घपात्र (सोना, चांदी, तांबे आदि का) को इस मंत्र से वहीं रखें :- ॐ ह्रः सामान्यार्घपात्रं स्थापयामि । इसके बाद प्रणवोच्चारण पूर्वक उसमें जल भरें । इसके बाद अंकुश मुद्रा द्वारा सूर्यमण्डल से तीर्थों का आवाहन करें :-
ॐ गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति । नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु ॥
ॐ ब्रह्माण्डोदरतीर्थानि करैः स्पृष्टानि ते रवे । तेन सत्येन देवेश तीर्थं देहि दिवाकर ॥
फिर गंधपुष्पाक्षत से पूजा करें – ॐ गङ्गादिसकलतीर्थेभ्यो नमः । ॐ हृदयादिषडङ्गदेवताभ्यो नमः । ॐ अँ आँ अर्कमण्डलाय द्वादशकलात्मने नमः, ॐ ईं वह्निमण्डलाय दशकलात्मने नमः, ॐ ऊँ सोमण्डलाय षोडषकलात्मने नमः । तत्पश्चात् दस बार मूल (नवार्ण) मंत्र जपकर धेनुमुद्रा से अमृतिकरण करें, फिर मत्स्यमुद्रा से आच्छादित करके योनिमुद्रा प्रदर्शित करें । थोड़ा जल लेकर सिर पर और अन्य पूजोपकरणों पर छिड़क दें। (ये विधियां जब एकांत में पूजा कर रहे हों तभी अपनाएं जहां पर भीड़ हो या प्रदर्शन वाली/फोटो सेशन वाली पूजाओं में निषिद्ध ।
संक्षिप्त विशेषार्घस्थापन विधि :- अपने बांयी ओर रक्तचन्दन, सिंदूर कुङ्कुमादि से एक त्रिकोण बनाएं, उसके भीतर षट्कोण और फिर वृत्त, फिर चतुर्भुज बनाएं – ॐ आसुरेखे वज्ररेखे हूं फट् स्वाहा। फिर ॐ लँ मंत्र द्वारा जल से सिक्त करें, ॐ वं इस मंत्र से मार्जन करें । षट्कोण में हृदयादि षडङ्ग पूजन करें । चतुर्भुज की पूर्व भूजा पर ॐ पूर्णगिरिपीठाय नमः, दक्षिणी भुजा की ॐ उड्डीयान पीठाय नमः, पश्चिमी भुजा की ॐ कामरूपपीठाय नमः और उत्तरी भुजा की ॐ जालन्धरपीठाय नमः से पूजा करें।
मध्य में ॐ आधारशक्तये नमः और ॐ कूर्मशोषाभ्यां नमः मंत्रों से पूजा करें। फिर इन मंत्रों से मंडल पूजा करें – ॐ आँ अर्कमण्डलाय द्वादशकलात्मने नमः, ॐ ईं वह्निमण्डलायाय दशकलात्मने नमः, ॐ ऊँ सोममण्डलाय षोडशकलात्मने नमः । तत्पश्चात् तीन पौये वाला (त्रिपादिका) आधारपात्र स्थापित करें – ॐ ह्रीं फट् । और फिर ॐ आधारपात्राय नमः मंत्र से पूजन कर लें।
तत्पश्चात् अर्घपात्र (सोना, चांदी, तांबे का या शङ्ख) स्थापित करें – ॐ अस्त्राय फट् । फिर अर्घपात्र की पूजा करें – ॐ ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै स्वर्गकपालाय सर्वाधाराय सर्वोद्भवाय सर्वशुद्धिमयाय सर्वासुर रुधिरारुणाय शुभ्राय सुधाभाजनाय देवीकपालाय नमः। फिर मूलमंत्र से जल भरें । अंकुश मुद्रा द्वारा सूर्यमण्डल से तीर्थों का आवाहन करें –
ॐ गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति । नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु ॥
ॐ ब्रह्माण्डोदरतीर्थानि करैः स्पृष्टानि ते रवे । तेन सत्येन देवेश तीर्थं देहि दिवाकर ॥
ॐ गङ्गाद्याः सरितः सर्वाः सरांसि जलदा नदाः । ह्रदाः प्रस्रवणाः पुण्याः स्वर्गपातालभूगताः ।
सर्वतीर्थानि पुण्यानि पात्रे कुर्वन्तु सन्निधिम् ॥
फिर जल को अभिमंत्रित करें – ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ह्रीं ॐ ह्रीं लीं ईं फट् हसौं हूँ । इसके बाद शङ्खमुद्रा, धेनुमुद्रा और योनिमुद्रा प्रदर्शित करके मत्स्य मुद्रा से आच्छादित करके दस बार मूल मंत्र जपें । देवी पूजनोपयुक्त पुष्प, अक्षत, दूर्वा, दहि, तिल, जौ, सर्वौषधि, बेलपत्र, कुशमूल आदि वस्तुएं देकर त्रिखण्ड मुद्रा प्रदर्शित करें। तत्पश्चात् तीर्थों का पूजन करें – ॐ गङ्गादि सकल तीर्थेभ्यो नमः। ॐ ह्रदादि षडङ्गदेवताभ्यो नमः। ॐ साङ्गसायुधसवाहनसपरिवारायै स्वेष्टदेवतायै दुर्गायै नमः ।
ॐ सूर्यकोटिप्रतीकाशं चन्द्रकोटिसुशीतलम् । अष्टादशभुजं देवं पञ्चवक्त्रं त्रिलोचनम् ॥ अमृतार्णवमध्यस्थं ब्रह्मपद्योपरि स्थितम् । वृषारूढं नीलकण्ठं सर्वाभरणभूषितम् ।। कपालखट्वाङ्गधरं घण्टाडमरुवादिनम् । पाशाङ्कुशधरं देवं गदामुशलधारिणम् ॥ खड्गखेटकपट्टीशमुद्गैरोच्छूलकुन्तिनम् । विचित्रखेटकं मुण्डं वरदाभयमालिनम् । लोहितं देवदेवेशं भावयेत्साधकोत्तमः । भावयेच्च सुधां देवीं चन्द्रकोट्ययुतप्रभाम् ॥ हिमकुन्देन्दुधवलां पञ्चवक्त्रां त्रिलोचनाम् । अष्टादशभुजैर्युक्तां सर्वानन्दकरोद्यताम् ॥ प्रहसन्तीं विशालाक्षी देवदेवस्य सम्मुखीम् ॥
इन मंत्रों को ध्यानपूर्वक पढकर सामान्यार्घ जल से तर्पण करे – ॐ आनन्द भैरवीं तर्पयामि । ॐ स्वेष्टदेवतां तर्पयामि ।
नवरात्र के आखरी दिन पर हवन कराने का मंत्र?
चाहिए ।
हवन की पूरी जानकारी इन आलेखों में दी गयी है :
https://karmkandvidhi.com/havan-vidhi/
https://karmkandvidhi.com/havan-vidhi-2/
https://karmkandvidhi.com/havan-vidhi-3/
https://karmkandvidhi.com/havan-vidhi-4/
https://karmkandvidhi.com/havan-vidhi-prashnottari/
https://karmkandvidhi.com/havan-karane-ki-vidhi/