संसर्गान्नश्यति तेजः – स्मृतियों और पुराणों के आलोक में संसर्ग दोष एवं कलिकाल के नियम

संसर्गान्नश्यति तेजः - स्मृतियों और पुराणों के आलोक में संसर्ग दोष एवं कलिकाल के नियम संसर्गान्नश्यति तेजः - स्मृतियों और पुराणों के आलोक में संसर्ग दोष एवं कलिकाल के नियम

“पतितों, चांडालों, मूर्खों, अभिमानियों और अन्त्यावसायियों के साथ कभी भी संसर्ग (निवास या संग) न करें।” – मनुस्मृति

यह आलेख धर्म ग्रंथों के आधार पर संसर्ग दोष और उसके प्रभावों का विस्तार से वर्णन करता है। इसमें मनुस्मृति और पाराशर स्मृति जैसे स्रोतों के माध्यम से बताया गया है कि कुसंगति, स्पर्श, भोजन और बातचीत से पाप-पुण्य का संचार एक व्यक्ति से दूसरे में होता है। शास्त्रों के अनुसार, दूषित व्यक्तियों के साथ रहने से मनुष्य का पुण्य और आत्मिक तेज नष्ट हो जाता है, जिसके लिए विभिन्न प्रकार के प्रायश्चित और शुद्धिकरण के नियम निर्धारित किए गए हैं।

संसर्गान्नश्यति तेजः – स्मृतियों और पुराणों के आलोक में संसर्ग दोष एवं कलिकाल के नियम

संसर्ग दोष विषयक “प्रमाण संकलन” सनातन आचार-मीमांसा और आध्यात्मिक ऊर्जा विज्ञान (Spiritual Energy Dynamics) का एक अत्यंत दुर्लभ, सूक्ष्म और अमूल्य संग्रह है। सनातन परंपरा में ‘संसर्ग’ (अवांछित संपर्क या संग) का केवल एक भौतिक विचार नहीं अपितु पुण्य-पाप के संक्रमण (Transmission of Negative Energy) का भी मुख्य कारक माना गया है, जिसे ऋषियों ने स्मृतियों (मनु, अत्रि, वसिष्ठ, देवल, पराशर आदि) में अकाट्य प्रमाणों के साथ प्रतिपादित किया है। इसलिये किसी भी प्रकार के दूषित संसर्ग से बचना आवश्यक होता है।

“कृतयुग (सत्ययुग) में पाप होने पर देश का, त्रेता में ग्राम का, द्वापर में कुल का, और कलियुग में केवल पापकर्म करने वाले कर्ता का त्याग करना चाहिए।” — पराशर स्मृति

“संसर्गान्नश्यति तेजः” अर्थात् कुसंगति और अवांछित संपर्क से मनुष्य के पुण्य, बुद्धि और आध्यात्मिक तेज का समूल नाश हो जाता है। सनातन आचार-मीमांसा में ‘संसर्ग’ (संगति या संपर्क) को केवल एक सामाजिक कृत्य नहीं, बल्कि पाप के संक्रमण (Transmission of Negative Energy) का मुख्य कारक माना गया है। जैसे संक्रामक रोग एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं, ठीक वैसे ही अदृश्य रूप से पापी के पाप और उसकी तामसिक तरंगें संसर्ग करने वाले निर्दोष व्यक्ति के भीतर प्रविष्ट हो जाती हैं।

मनुस्मृति, वसिष्ठ और बौधायन स्मृति के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति किसी पतित के साथ निरंतर एक वर्ष तक रहता है, उसके साथ वाहन, आसन या भोजन साझा करता है, तो वह एक वर्ष में पतित होता है। किन्तु यदि वह उसके साथ याजन (यज्ञ कराना), अध्यापन (पढ़ाना) या योनिसंबन्ध (विवाह) स्थापित करता है, तो वह सद्यः (तत्काल) पतित हो जाता है। लिखित स्मृति और मनु महाराज स्पष्ट निर्देश देते हैं कि जो मनुष्य जिस श्रेणी के पतित का संसर्ग करेगा, उसे अपनी आत्मा की शुद्धि के लिए उसी महापाप का कठोर व्रत (प्रायश्चित्त) करना होगा, जो उस मूल पापी के लिए निर्धारित है।

छह प्रकार के संसर्ग :

“वार्तालाप, स्पर्श, श्वास का संपर्क, यात्रा, एक आसन पर बैठना और सह-भोजन से मनुष्यों के पाप एक से दूसरे में संक्रमित होते हैं।” — देवल स्मृति

  • संलाप: पतित या म्लेच्छ व्यक्तियों से व्यर्थ की आत्मीय बातचीत या प्रपंच करना।
  • स्पर्श: अशुद्ध या शास्त्र-बहिष्कृत व्यक्ति को छूना।
  • निःश्वास: अत्यंत निकट बैठने के कारण एक-दूसरे की श्वास-वायु (उच्छ्वास) के संपर्क में आना।
  • सह-यान: एक ही वाहन (घोड़ा, रथ, गाड़ी आदि) पर साथ यात्रा करना।
  • सह-आसन: एक ही आसन या चौकी पर साथ बैठना।
  • सह-भोजन: एक ही पङ्क्ति में या एक साथ भोजन ग्रहण करना।
संसर्गान्नश्यति तेजः - स्मृतियों और पुराणों के आलोक में संसर्ग दोष एवं कलिकाल के नियम

निन्द्यास्वष्टासु चान्यासु स्त्रियो रात्रिषु वर्जयन् । ब्रह्मचार्येव भवति यत्र तत्राश्रमे वसन् ॥
मनु स्मृति/३/५०

न संवसेच्च पतितैर्न चाण्डालैर्न पुल्कसैः । न मूर्खैर्नावलिप्तैश्च नान्त्यैर्नान्त्यावसायिभिः ॥
न शूद्राय मतिं दद्यान्नोच्छिष्टं न हविष्कृतम् । न चास्योपदिशेद्धर्मं न चास्य व्रतमादिशेत् ॥
यो ह्यस्य धर्ममाचष्टे यश्चैवादिशति व्रतम् । सोऽसंवृतं नाम तमः सह तेनैव मज्जति ॥

मनु स्मृति/४/७९ – ८१

अकुर्वन्विहितं कर्म निन्दितं च समाचरन् । प्रसक्तश्चेन्द्रियार्थेषु प्रायश्चित्तीयते नरः ॥
अकामतः कृते पापे प्रायश्चित्तं विदुर्बुधाः । कामकारकृतेऽप्याहुरेके श्रुतिनिदर्शनात् ॥
अकामतः कृतं पापं वेदाभ्यासेन शुध्यति । कामतस्तु कृतं मोहात्प्रायश्चित्तैः पृथग्विधैः ॥
प्रायश्चित्तीयतां प्राप्य दैवात्पूर्वकृतेन वा । न संसर्गं व्रजेत्सद्भिः प्रायश्चित्तेऽकृते द्विजः ॥
इह दुश्चरितैः के चित्के चित्पूर्वकृतैस्तथा । प्राप्नुवन्ति दुरात्मानो नरा रूपविपर्ययम् ॥

मनुस्मृति/११/४४ – ४८

संवत्सरेण पतति पतितेन सहाचरन् । याजनाध्यापनाद्यौनान्न तु यानासनाशनात् ॥
यो येन पतितेनैषां संसर्गं याति मानवः । स तस्यैव व्रतं कुर्यात्तत्संसर्गविशुद्धये ॥

मनुस्मृति/११/१८० – १८१

महापातकसंस्पृष्टः स्नानमेव विधीयते । संस्पृष्टस्य यदा भुङ्क्ते स्नानमेव विधीयते ॥
पतितैः सह संसर्ग मासार्धं मासमेव वा । गोमूत्रयावकाहारो मासार्धेन विशुध्यति ॥

अत्रि संहिता २५९ – २६०

यो येन पतितेनैवै संसर्गे याति मानवः । स तस्यैव व्रतं कुर्यात्तत्संसर्गविशुद्धये ॥
ब्रह्महपातकिस्पर्शे स्नानं येन विधीयते । तेनैवोच्छिष्टसंस्पृष्टः प्राजापत्यं समाचरेत् ॥
ब्रह्महा च सुरापायी तथैव गुरुतल्पगः । महान्ति पातकान्याहुस्तरसंसर्गी च पञ्चमः ॥

लिखित स्मृति ७४ – ७६

संवत्सरेण पतति पतितेन सहाऽऽचरन् । याजनाध्यापनाद्यौनान्न तु यानासनादिति ॥
वशिष्ठ स्मृति १/२२

पतितेन तु संपर्के मासं मासार्धमेव च । गोमूत्रयावकाहारो मासार्धेन विशुध्यति ॥
पतिताद्द्रव्यमादते भुङ्क्ते वा ब्राह्मणो यदि । कृत्वा तस्य समुत्सर्गमतिकृच्छ्रं चरेद्द्विजः ॥

संवर्त स्मृति/१९९ – २००

त्यजेद्देशं कृतयुगे त्रेतायां ग्राममुत्सृजेत् । द्वापरे कुलमेकं तु कर्तारं तु कलौ युगे ॥
कृते संभाषणादेव त्रेतायां स्पर्शनेन च । द्वापरे त्वन्नमादाय कलौ पतति कर्मणा ॥

पाराशरस्मृति/१/२५ – २६

व्रतोपेतो दीक्षितः स्यात् ॥
न परपापं वदेन्न क्रुध्येन्न रोदेन्मूत्रपुरीषे नावेक्षेत ॥
अमेध्यं दृष्ट्वा जपति ॥
अबद्धं मनो दरिद्रं चक्षुः सूर्यो ज्योतिषां श्रेष्ठो दीक्षे मा मा हासीरिति ॥

बौधायन स्मृति/१/७/२७ – ३०

संवत्सरेण पतति पतितेन समाचरन् । याजनाध्यापनाद्यौनान्न तु यानासनाशनादिति ॥
बौधायन स्मृति/२/१/८८

संलापस्पर्शनिःश्वाससहयानासनाशनात्। याजनाध्यापनाद्यौनात्पापं संक्रमते नृणाम् ॥
याजनं योनिसंबन्धं स्वाध्यायं सहभोजनम्। कृत्वा सद्यः पतत्येव पतितेन न संशयः ॥
संवत्सरेण पतति पतितेन सहाऽऽचरन्। याजनासनयज्ञादि कुर्वाणः सार्वकामिकम् ॥

देवल स्मृति/३३ – ३५

म्लेच्छान्नं म्लेच्छसंस्पर्शो म्लेच्छेन सह संस्थितिः। वत्सरं वत्सरादूर्ध्वं त्रिरात्रेण विशुध्यति ॥
देवल स्मृति/४४

सभायां स्पर्शने चैव म्लेच्छेन सह संविशेत्। कुर्यात्स्नानं सचैलं तु दिनमेकमभोजनम् ॥
देवल स्मृति/५८

व्रात्यानां यजनं कृत्वा परेषामन्त्यकर्म च । अभिचारमहीनं च त्रिभिः कृच्छ्रैर्विशुद्ध्यति ॥
कूर्म पुराण/उत्तर भाग/३४/४४

वेदधर्मपुराणानां चण्डालस्य तु भाषणे । चान्द्रायणेन शुद्धिः स्यान्न ह्यन्या तस्य निष्कृतिः ॥
कूर्म पुराण/उत्तर भाग/३४/६१

शास्त्रीय संसर्ग-दोष एवं कल्प सारणी (Quick Reference Table)

संसर्ग का प्रकार (Type of Contact)तत्कालिक प्रभाव / शास्त्रीय दोष (Scriptural Effect)शुद्धि / अनिवार्य प्रायश्चित्त विधान (Required Penance)
१. महापातकी संसर्ग (याजन, अध्यापन, विवाह)सद्यः पतन (तत्काल पतन)। वह व्यक्ति स्वयं पंचम महापातकी के तुल्य हो जाता है।१ वर्ष तक निरंतर संसर्ग होने पर: पापी के समान ही कठोर महाव्रत या चान्द्रायण
२. सामान्य पतित संसर्ग (सह-आसन, सह-यान)एक वर्ष के भीतर तेज और ब्रह्मवर्चस का समूल नाश।मासार्ध (१५ दिन) या एक मास का गोमूत्र-यावक आहार व स्नान।
३. म्लेच्छ संस्थिति व संस्पर्शआत्मिक मलिनाता और वैदिकाचार का ह्रास।सचैल स्नान, एक दिन का पूर्ण उपवास (देवल स्मृति) या त्रिरात्र व्रत।
४. व्रात्य व अन्त्यज अनुष्ठानपुरोहित का ब्राह्मणत्व खंडित होना, मंत्रों का निष्फल होना।त्रिभिः कृच्छ्रैः (तीन कृच्छ्र व्रत) द्वारा काय-शुद्धि एवं शुद्धि यज्ञ।
५. शूद्र को व्रत-धर्म उपदेश‘असंवृत’ नामक घोर अन्धकारमय नरक की प्राप्ति।चान्द्रायण व्रत और पुरोहित का पुनः संस्कार (उपनयन)।

सनातन शास्त्रों के अनुसार संगति और संपर्क का मनुष्य के आत्मिक जीवन पर सीधा प्रभाव पड़ता है। देवल स्मृति का यह वचन कि — “संलापस्पर्शनिःश्वाससहयानासनाशनात्। याजनाध्यापनाद्यौनात्पापं संक्रमते नृणाम्” — यह स्पष्ट करता है कि बातचीत, स्पर्श, यहाँ तक कि एक साथ बैठने या एक दूसरे के निःश्वास (सांस की वायु) के संपर्क में आने से भी पाप संक्रमित होता है। शास्त्रों ने ‘महापातकी’ का संसर्ग करने वाले को ‘पंचम महापातकी’ माना है।

शास्त्रों में स्पृश्यास्पृश्यता विचार: शुद्धि-मर्यादा, स्पर्श-निषेध और प्रायश्चित्त का संपूर्ण शास्त्रीय प्रमाण संग्रह

तथापि, ऋषियों ने काल के प्रभाव को भी भली-भांति समझा है। पराशर स्मृति का यह क्रांतिकारी उद्घोष कि — “कृते संभाषणादेव त्रेतायां स्पर्शनेन च। द्वापरे त्वन्नमादाय कलौ पतति कर्मणा” — यह कलयुग के यजमानों और पुरोहितों के लिए परम संबल है।

कलयुग में केवल बातचीत या छूने से पाप का संक्रमण नहीं होता अर्थात संसर्ग से पातकी नहीं होता, बल्कि जब व्यक्ति स्वयं सक्रिय रूप से कोई शास्त्र-विरुद्ध कुकर्म (कर्मणा) करता है, तभी पतन होता है। यहां पापकर्म का भागी कहा गया है न कि संसर्ग दोष का अभाव।

निष्कर्ष

इस संपूर्ण विमर्श का सार यह है कि “संसर्ग” मनुष्य के अंतःकरण को वैसा ही बना देता है जैसा उसकी संगति का पात्र होता है। मनुस्मृति (४/७९) का स्पष्ट निर्देश है— “न संवसेच्च पतितैर्न चाण्डालैर्न पुल्कसैः” अर्थात् अपने कल्याण की इच्छा रखने वाले द्विज को कभी भी पतितों और मूर्खों के साथ नहीं रहना चाहिए। यद्यपि कलियुग में ऋषियों ने “कलौ पतति कर्मणा” कहकर हमें केवल स्पर्श और संभाषण के दोष से मुक्त किया है, किन्तु ये महापातक विषयक है दोष संक्रमण से सम्बंधित नहीं है। अर्थात संसर्ग से दोष नहीं होता ऐसा नहीं समझना चाहिये।

अतः, अपने तेज की रक्षा और आत्मकल्याण हेतु स्वेच्छाचारी, म्लेच्छ और पतित व्यक्तियों के साथ याजन, अध्यापन और यौन-संबंध (विवाह) का पूर्ण त्याग करना ही वास्तविक सनातन मार्ग है।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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