संशोधित आद्य श्राद्ध विधि – वाजसनेयी

संशोधित आद्य श्राद्ध विधि - वाजसनेयी संशोधित आद्य श्राद्ध विधि - वाजसनेयी

“मध्याह्न ही एकोद्दिष्ट का एकमात्र उचित काल है, सायाह्न श्राद्ध के लिए वर्जित है।”

श्राद्ध विषयक चर्चाओं के लिये यहां एक विशेष श्रेणी श्राद्ध रत्नाकर बनाई गयी है और प्रामाणिक तथ्यों के अनुसार विशेष महत्वपूर्ण तथ्यों का विश्लेषण भी निरंतर किया जाता है। किसी की मृत्यु के पश्चात् एकादशाह को जो श्राद्ध किया जाता है उसे ही आद्य श्राद्ध कहते हैं, यह प्रेत के निमित्त एकोद्दिष्ट होता है। एकादशाह श्राद्ध की विधि पूर्व प्रकाशित भी है किन्तु अनेकानेक अन्यान्य प्रामाणिक तथ्यों से ज्ञात होता है कि संशोधन की आवश्यकता है अस्तु यहां संशोधित आद्य श्राद्ध की विधि समंत्र दी गयी है।

पूर्व प्रकाशित “एकादशाह श्राद्ध विधि” में कुछ विशेष चर्चा भी की गयी है जो मुख्यतः व्यावहारिक दृष्टिकोण से प्रेरित था, किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं कि सम्पूर्ण चर्चा व्यावहारिक ही थी अपितु कुछ विशेष तथ्य शास्त्रोचित नहीं होंगे ऐसा है। यहां उन सभी तथ्यों की पुनरावृत्ति भी नहीं की जायेगी क्योंकि वो आलेख भी यथावत प्रकाशित ही है एवं लिंक भी यहां संलग्न किया गया है।

संशोधित आद्य श्राद्ध विधि – वाजसनेयी

“शास्त्रदस्यु वही है जो प्रमाणों को जानकर भी देशाचार के नाम पर शास्त्रविरुद्ध अधर्म करता-कराता है।”

एकादशाह के दिन शय्या आदि विविध सामग्री दान भी की जाती है। मिथिला में विशेष रूप से पञ्चदान की विधि पाई जाती है। यहां दी गयी एकादशाह श्राद्ध विधि मिथिला में प्रचलित वाजसनेयी पञ्चदान श्राद्ध विधि है। मिथिला के अतिरिक्त अन्य देशों में थोड़ी भिन्नता भी देखी जाती है, किन्तु मुख्य विधि एक ही है। पूर्व प्रकाशित व सुगम श्राद्ध विधि से यहां संशोधित श्राद्ध में अंतर क्या है इसको समझने के लिये पूर्व प्रकाशित “एकादशाह श्राद्ध विधि” का भी अवलोकन कर सकते हैं जो यथावत रहेगा। हमारे पास उसे ही संशोधित करने का भी विकल्प था जो उचित प्रतीत नहीं हुआ पृथक प्रकाशन होने से दोनों का अंतर भी स्पष्ट हो जायेगा।

श्राद्ध विधि से पूर्व संशोधन को समझना अत्यावश्यक है यदि तथ्यों और नियमों को न समझें, शास्त्रीय विधान को ही न समझें तो श्राद्ध विधि उचित है ऐसा नहीं समझ पायेंगे अपितु अनुचित ही प्रतीत होगा। इसलिये जो विश्लेषण किया गया है वो विश्लेषण अधिक महत्वपूर्ण है। सम्पूर्ण विश्लेषण तो यहां नहीं किया गया है अपितु अनेकानेक आलेखों में पृथक-पृथक भी किया गया है अस्तु अन्यान्य आलेखों का भी जो श्राद्ध रत्नाकर में सन्निहित है अवलोकन करना चाहिये।

संशोधित श्राद्ध विधि के प्रकाशन में कितना काल लगेगा कुछ कहा नहीं जा सकता, किन्तु जो प्राप्त करना चाहेंगे उनके लिये प्रिंट करके उपलब्ध करने का प्रयास किया जायेगा। इसके लिये व्यय कुछ अधिक आएगा।

दान, पञ्चदान एवं गोदान

शय्या, काञ्चन पुरुष, गाय, छाता, और उपानद् ये पञ्चदान कहे गए हैं। इनमें से शय्या और काञ्चन पुरुष श्राद्धारंभ से पूर्व, छाता और उपानद् प्रेत का आवाहन के बाद और गाय श्राद्ध के अंत में दक्षिणा से पूर्व दान करने का व्यावहारिक प्रचलन है। इस प्रकार से दान करने के पीछे का रहस्य तो रहस्य ही है किन्तु यहां यह देखना आवश्यक है कि क्या इससे किसी शास्त्रीय विधि का उल्लंघन भी होता है यदि होता है तो अनुचित अन्यथा व्यवहार/देशाचार के रूप में ग्राह्य। सपात्रक शब्द का प्रयोग अपात्रक को भलीभांति समझने के लिये किया गया है। श्राद्ध का तात्पर्य सपात्रक ही होता है, पात्राभाव विधि में अपात्रक शब्द प्रयुक्त होता है।

एकोद्दिष्ट के मध्य में जो दान का विषय है वो अन्यान्य सभी प्रकार से उचित सिद्ध होने पर भी अपात्रक श्राद्ध में अनुचित सिद्ध हो जाता है। अपात्रक श्राद्ध का तात्पर्य ही पात्राभाव में बिना पात्र (महापात्र) के कुशप्रयोग पूर्वक किया जाने वाला। पात्राभाव का तात्पर्य ब्राह्मण या महापात्र की अनुपस्थिति तो है ही किन्तु उपस्थित होते हुये भी पात्रता का अभाव होना मुख्य भाव है। श्राद्ध का वर्त्तमान स्वरूप जो देखा जाता है वह कहने को तो अपात्रक है किन्तु सपात्र का भी कुछ अंश उपस्थित है मात्र अर्चन-भोजनादि से अपात्रक और दान-दक्षिणादि से सपात्रक है।

सपात्रक और अपात्रक श्राद्ध
सपात्रक और अपात्रक श्राद्ध

वर्त्तमान के मूर्खाचार्यों की समस्या यह है कि उनके पास न तो मनन शक्ति है न ही पूर्वाग्रह से ग्रसित विषय के विपरीत शास्त्रोचित श्रवण की शक्ति। अर्थात यहां जो श्राद्ध विधि संशोधन पूर्वक प्रकाशित किया जा रहा है मेरे जीवनकाल में इसका प्रचलन होना भी संदिग्ध है, मैं ऐसी आशा-अपेक्षा कर ही नहीं पा रहा हूँ तथापि परवर्ती विवेकवान आचार्यों के लिये मेरा विमर्श पूर्वक स्थापित शास्त्रोचित तथ्य ग्राह्य होगा और उस काल में इसकी उपयोगिता व लाभ उनको प्राप्त होगा।

इस कथन का तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि मैं अपने जीवित रहते इसके प्रचलन का निषेध कर रहा हूँ, विद्वद्जनों (मूर्खाचार्यों से भिन्न) की आस्था शास्त्रोचित में ही होती है और यदि वो चिंतन-मनन पूर्वक ग्रहण करें तो मेरे लिये तुष्टिकारक होगा साथ ही ऐसे विद्वद्जनों से सूचनाप्राप्ति की अपेक्षा रखूँगा। सूचनार्थ : 7992328206

इस विषय में चिंतन हेतु जिन्होंने मुझे प्रेरित किया वो साधुवाद के अधिकारी हैं एवं हमारे बेगूसराय जिले के ही दरियापुर में वास करते हैं हैं। आपमें से बहुत सारे विद्वद्जन उनसे भिज्ञ भी होंगे वो हैं विद्यागौरव गिरधारी पाठक। अपात्रक-सपात्रक के विषय में पुनर्विचार, मनन-विश्लेषण का यह विषय मुझे उनसे ही प्राप्त हुआ। गिरिधारी जी भी शास्त्रनिष्ठा रखने वाले विद्वान हैं और शास्त्रनिष्ठों से ही मेरा संवाद संभव है।

अपात्रक का सीधा तात्पर्य है या तो पात्र ब्राह्मण (महापात्र) उपलब्ध ही नहीं अथवा देहधारी जातिमात्र यदि उपलब्ध भी हैं तो उनमें पात्रता का अभाव। श्राद्धकर्त्ता के पात्रत्वाभाव का विमर्श भी किया जायेगा एवं ये कर्माधिकार प्रकरण से संबंधित है और कर्माधिकार विषयक कई विमर्श पूर्वकृत उपलब्ध है। यहां मुख्य तात्पर्य सदेह उपस्थित ब्राह्मण में पत्रत्वाभाव ही है और इसी कारण कुशाप्रयोग (शास्त्र विहित विधि) से श्राद्ध संपन्न किया जाता है एवं अपात्रक श्राद्ध का यही तात्पर्य है।

विद्यागौरव गिरधारी जी महाराज
विद्यागौरव गिरधारी जी महाराज

अब प्रश्न उत्पन्न होता है कि यदि अपात्रक श्राद्ध ही है तो मात्र अर्चन-भोजन के लिये ही क्यों, दान-दक्षिणा के लिये क्यों नहीं ? इसका उत्तर नहीं मिल पायेगा और मूर्खाचार्य यहां देशाचार/लोकाचार आदि का राग अलापेंगे तो अलापें; उनके लिये यही शोभनीय है शास्त्रोचित विमर्शकों के लिये यह शोभनीय नहीं है। यदि मूर्खाचार्य विमर्श में सक्षम नहीं तो इसका तात्पर्य यह नहीं होता कि मेरे लिये भी विचार का अधिकार भी समाप्त हो गया।

अपात्रक का तात्पर्य अपात्रक ही हो सकता है सपात्रक मिश्रित नहीं। अस्तु महापात्र को कुशोदक पूर्वक दान-दक्षिणा आदि देने से अपात्रक बाधित होता है और सपात्रक संभव नहीं इस कारण पूर्णरूपेण अपात्रक को ही ग्रहण करना उचित पक्ष है जिससे इसका भी बाध न हो और इसका तात्पर्य यह है कि दान-दक्षिणा भी अपात्रक विधि से ही संपन्न किये जायें अर्थात महापात्र को कुशोदक ग्रहण करने की आवश्यकता नहीं है। पूज्यत्वेन कहकर वरण किया जाता है इसमें भी संशोधन किया जाय।

इसके साथ ही कई विवेकशून्य मूर्खाचार्यों को दो विशेष कार्य के लिये विवाद करते भी देखा जाता है : प्रथम महापात्र के क्षौर हेतु और द्वितीय प्रेतोत्सर्जित अन्न के भक्षण हेतु। अरे मूर्खाचार्यों तुम प्रथम यह तो निर्धारित करो कि सपात्रक श्राद्ध करोगे अथवा अपात्रक। यदि सपात्रक करोगे तो उसकी विधि क्या होगी और यदि अपात्रक करोगे तो उसकी विधि क्या होगी ? अपात्रक श्राद्ध में भी महापात्र को उस अवस्था में क्षौर करना अनिवार्य होगा यदि उसने अशौच (यजमान का) में भोजन किया हो अन्यथा नहीं।

प्रेतोत्सर्जित भोजन का थोड़ा सा अन्न भक्षण करना भी दोषपूर्ण है। अपात्रक श्राद्ध में इसका कोई औचित्य ही नहीं सिद्ध होता किन्तु दोष सिद्ध होता है। ये भोजन उसी समय किया जा सकता है जिस समय उत्सर्ग किया गया हो, पिंडदान के पश्चात् नहीं अपितु भोजन के पश्चात् पिण्डदान होगा। द्वितीय तथ्य यह भी है कि जैसे-तैसे खड़े-खड़े भी थोड़ा से अन्न महापात्र बाध्यतापूर्वक ग्रहण करते हैं तदनन्तर भोजन करते हैं। यहां पुनर्भोजन दोष उत्पन्न होता है एवं बाध्य करने का दोष होगा सो पृथक।

अस्तु क्षौरकर्म हेतु यदि अशौच में भोजन किये हों तो कारण बनता है किन्तु प्रेतोत्सर्जित अन्नग्रहण का कोई कारण नहीं अपितु शास्त्रविरुद्ध सिद्ध होता है। इसी प्रकार आद्यश्राद्ध (एकोद्दिष्ट) के मध्य में छाता-जूता-गाय दान का भी औचित्य नहीं बनता। यदि करते हैं तो अपात्रक होना बाधित होगा। दान-दक्षिणा की विधि भी “यथानामगोत्राय” की ही होगी एवं कुशोदक ग्रहण नहीं किया जा सकता, करने से अपात्रक होना असिद्ध होगा।

दान प्रकरण में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि दाल-भात आदि के पाक पात्र में दो दाना डालकर शेष पृथक ही रख दिया जाता है। यह भी अनुचित है सभी दाल-चावल आदि पाकपात्र में ही होने चाहिये यदि उसे भर दिया जाय तो उत्तम। यहीं पर थाली में चूड़ा या पूड़ी आदि की आवश्यकता होती है, श्राद्ध में नहीं।

यहां मैं किसी पद्धतिकार की आलोचना नहीं कर रहा हूँ न ही उनके ज्ञान पर संदेह कर रहा हूँ अपितु उनकी तुलना में मैं सोलहवीं कला भी सिद्ध नहीं होता अर्थात ये दुस्साहस मैं कर ही नहीं रहा। किन्तु जिस काल में पूर्व के विद्वान उपस्थित थे और कालानुसार विवेकप्रयोगपूर्वक संशोधन किया तो ये अधिकार वर्त्तमान में उपस्थित विद्वानों को भी निःसंदेह है एवं परवर्तियों को भी प्राप्त होगा। वर्त्तमान में अधिकांशतः मूर्खाचार्य ही भरे-पड़े हैं और शास्त्रसम्मत विमर्श करने वालों की संख्या अत्यल्प होने से उनकी सरलतापूर्वक उपेक्षा कर दी जाती है।

सविधि षोडश श्राद्ध कैसे करें - Shodasha shraddh

मूर्खाचार्यों ध्यान रखना मेरी संशोधित श्राद्ध विधि ही भविष्य में ग्राह्य होगी और उस समय तुम्हारे वंशज भी तुम्हारे कारण निम्नलोचन होंगे। तुम्हारी मूर्खता के कारण तुम्हारे वंशज भी तुमको दुत्कारेंगे (मानसिक)। उपरोक्त विमर्श का तात्पर्य यह है कि यदि अपात्रक श्राद्ध की शास्त्रोचित विधि के अनुसार समझने का प्रयास करें तो :

  • यदि महापात्र ने अशौच में भोजन नहीं किया है तो क्षौर कर्म निरर्थक है और कराने वाले धूर्ताचार्य।
  • यदि अपात्रक विधि से श्राद्ध करना चाहें तो पूज्यत्वेन कहकर महापात्र का वरण नहीं होगा अपितु अपात्रकश्राद्धे ब्राह्मणत्वेन कहकर किया जायेगा।
  • किसी भी दान में महापात्र को कुशोदक प्रदान नहीं किया जायेगा अपितु जिस प्रकार पुरोहित का भाग यथानामगोत्राय कहकर कुशब्राह्मण को दिया जाता है उसी प्रकार महापात्र के लिये भी किया जायेगा।
  • सभी दान एकोद्दिष्ट पूर्व ही किया जायेगा, एकोद्दिष्ट के मध्य में कोई दान नहीं हो सकता।
  • एकोद्दिष्ट की दक्षिणा भी यथानामगोत्राय उच्चारण करके कुशब्राह्मण को ही प्रदान किया जायेगा न कि महापात्र को हस्तोदक देकर।
  • प्रेतोत्सर्जित अन्न का भक्षण महापात्र नहीं करेंगे।

श्राद्धकाल और सावधानी

धूर्ताचार्यों ने मध्याह्न का न जाने कहां से कैसे क्या अर्थ कर लिया कि एकोद्दिष्ट मध्याह्न तो छोड़िये अपराह्न में भी नहीं अपितु सायाह्न में किया जाता है। सायाह्न ही नहीं चतुर्थ प्रहर भी श्राद्ध के लिये निषिद्ध है तो किस आधार से सायाह्न में एकोद्दिष्ट करते हो ? यदि मध्याह्न में श्राद्ध के लिये प्रस्थान करने से श्राद्ध सायाह्न में होता है तो सीधा तात्पर्य है कि प्रस्थान प्रातः ही किया जायेगा तभी मध्याह्न में एकोद्दिष्ट संभव है अन्यथा असंभव। इन मूर्खाचार्यों ने जो शास्त्रसिद्ध होने वाले विषयों पर देशाचार/लोकाचार आदि का राग अलापते हैं इस विषय में कभी चिंतन ही नहीं किया।

यदि ऐसी चिंतन-मनन शक्ति मेरे पास है तो मैं ही करूँगा न। यह सत्यापन करना अनिवार्य है कि मैं वर्त्तमान काल में संशोधन करने का अधिकारी हूँ और सबके लिये वह बाध्यकारी भी है। खंडन का अवसर प्रदान किया जायेगा और जिसे लगे कि इसका शास्त्र से खंडन हो सकता है तो करने के लिये स्वतंत्र है। यदि प्रमाण पूर्वक इस तथ्य को खंडित कर सको और सायाह्न में ही एकोद्दिष्ट सिद्ध कर दो तो किया जा सकता है। यदि ऐसा नहीं कर सकते तो जो सिद्ध किया गया है वह बाध्यकारी होगा और अस्वीकार करने पर शास्त्रदस्यु संज्ञक होओगे, ब्रह्मघात से युक्त होओगे।

मेरे आक्रोश का कारण यह है कि यदि किसी ब्राह्मण के यहां श्राद्ध कराने जाता हूँ तो वहां ब्राह्मण का कर्म तो कई बार सुनने को मिलता है किन्तु देखने को कुछ भी नहीं। इधर ही एक पंडित के श्राद्ध में गया जहां लगभग १५ पंडित उपस्थित भी थे और कर्त्ता स्वयं को भी पंडित घोषित करता है, गिरिधारी जी ने ही बिलम्व होते देख उसे श्राद्धकाल का स्मरण कराया तो उसने कहा कि उचित काल तो अपराह्न होता है। ऐसे स्वघोषित पंडितों को ही मैं अपण्डित, मूर्खाचार्य, शास्त्रदस्यु आदि सम्बोधित करता हूँ। आशा है विद्वद्जनों को सभी बातें शास्त्रसम्मत ही लगेगी।

एकोद्दिष्ट का उचित काल मध्याह्न है उसमें भी कुतुप काल अधिक विशेष है। एकोद्दिष्ट में पूर्वाह्ण का निषेध है किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं कि पूर्वाह्ण में नित्यकर्म, दान, पाक भी नहीं होंगे। ये सभी मध्याह्न के आरम्भ होते-होते संपन्न हो जाने चाहिये तभी मध्याह्न में एकोद्दिष्ट संभव हो सकता है। एकोद्दिष्ट के लिये अपराह्न का भी निषेध है और सायाह्न व रात्रि तो निषिद्ध है ही। प्रमादादि व विघ्नवश विलम्ब होने पर आगे भी कर्तव्य होता है किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं होता कि अपराह्न से सायाह्न तक ही करें। श्राद्धकाल को लेकर पर्याप्त सजगता आवश्यक है। एकादशाह को एकोद्दिष्ट श्राद्ध ही किया जाता है।

वरण में सावधानी

देव और पितृकर्म में प्रेतकर्म के ब्राह्मण से भिन्न ब्राह्मण की आवश्यकता होती है। प्रेतकर्म में वर्णित ब्राह्मण देव-पितृकर्म का अधिकारी नहीं होता अर्थात उसका अधिकार नष्ट हो जाता है और यही कारण है कि प्रेतकर्म करने वाले ब्राह्मण को महापात्र कहा जाता है एवं प्रेतकर्म से भिन्न किसी कर्म में ग्राह्य नहीं होते। अस्तु आद्यश्राद्ध (एकादशाह) को केवल और केवल महापात्र का ही वरण किया जाना चाहिये पुरोहित का नहीं।

पुरोहित और अन्य वो सभी वेदादि पाठ करने वाले ब्राह्मण जो आंगन में कलश पूजा के उपरांत भोजन करने वाले हों उनका वरण सपिंडीकरण श्राद्ध काल में होगा एकादशाह को नहीं। उनकी उपस्थिति का कारण अधिकारी का अभाव होना है। अधिकारी के अभाव में भी सभी कर्म हों इस कारण पुरोहित व वेदादि पाठ के निमित्त देव-पितृकर्म के अधिकारी ब्राह्मण भी एकादशाह को उपस्थित होते हैं। अभाववश कर्म के निमित्त अनाधिकार होने से उपस्थित होने का तात्पर्य है कि वरण नहीं ग्रहण कर सकते।

दोष यह है कि वरण ग्रहण करने के पश्चात् एकादशाह को भोजन करना भी अनिवार्य होगा और द्वादशाह को सपिंडीकरण में जहां आवश्यकता है, जिसके अधिकारी हैं वहां अनधिकारी हो जायेंगे। अस्तु महापात्र के अतिरिक्त अन्य सभी देव-पितृकर्म के अधिकारी ब्राह्मणों को एक विशेष सावधानी की आवश्यकता होती है कि जब उन्हें श्राद्ध में उपस्थित होने का आमंत्रण मिले तभी वो वरण व भोजन अस्वीकार कर दें अन्यथा निमंत्रण मान्य होगा और भोजन करना अनिवार्य होगा, वरण सपिण्डीकरण काल में ग्रहण किया जायेगा और भोजन कलश पूजा के उपरांत। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि :

  • एकादशाह के दिन केवल और केवल महापात्र का ही वरण शास्त्रोचित है।
  • देव-पितृकर्म सपिंडीकरण में होता है और सपिंडीकरण काल में ही देव-पितृकर्म वाले ब्राह्मण का वरण किया जा सकता है।
  • देव-पितृकर्म से संबंधित ब्राह्मणों की एकादशाह को उपस्थिति का कारण प्रेतकर्म का अधिकार न होकर अधिकारी का अभाव होना है।
  • देव-पितृकर्म संबंधी ब्राह्मण (पुरोहित/पंडित वर्ग) जब श्राद्ध में उपस्थिति का आमंत्रण प्राप्त हो तभी एकादशाह को वरण व भोजन मना कर दें।

इससे संबंधित एक अन्य विषय भी है जो अत्यंत ही महत्वपूर्ण है वो है वार्षिक श्राद्ध। लोगों की ही नहीं विशेषरूप से कर्मकांडियों का विवेक विलुप्त हो चुका है और श्राद्ध शब्द नहीं सुना कि महापात्र का कर्म बोल देंगे। महापात्र और प्रेतकर्म का संबंध है एवं पुरोहितवर्ग के ब्राह्मण देव-पितृ से संबंधित होते हैं। वार्षिक श्राद्ध प्रेत श्राद्ध नहीं होता पितृकर्म है और पितृकर्म होने से महापात्र अग्राह्य हो जाते हैं एवं पुरोहित ही ग्राह्य होते हैं। किन्तु विवेकशून्यता की सिद्धि इसी तथ्य से हो जाती है कि ब्राह्मणवर्ग वार्षिक श्राद्ध में अधिकांशतः महापात्र को ही आमंत्रित करते हैं।

नित्यकर्म

नित्यकर्म किसी का भी स्वयं का कर्म है और इसमें ब्राह्मण की आवश्यकता नहीं होती। तथापि यजमान नित्यकर्मादि से रहित होता है अस्तु सूर्य को अर्घ्य प्रदान करके १० बार गायत्री जप कराकर तर्पण व पंचदेवता पूजन ब्राह्मण को कराना ही होगा। तर्पण और पंचदेवता-विष्णु पूजन ही क्यों कराया जा सकता है एवं संध्या क्यों नहीं कराया जा सकता ये विचार का विषय है।

तर्पण महलायादि अनेकानेक अवसर पर ब्राह्मण कराते हैं एवं पंचदेवता-विष्णु पूजन तो सभी पूजनादि में कराते ही हैं इस कारण ये ब्राह्मण को ही कराना पड़ेगा। किन्तु संध्या कराना कुछ धूर्ताचार्यों ने आरम्भ किया है क्योंकि संध्या कराने का कर्म है ही नहीं। यदि यजमान को आता हो तो प्रतिदिन यथाकाल करता हो तो स्वयं ही कर ले और यदि नहीं करता है, संध्याविधि ज्ञात ही नहीं तो कोई औचित्य ही नहीं बनता।

यदि श्राद्ध में अनिवार्य सिद्ध किया जा सके तो धूर्ताचार्यों को चुनौति है सिद्ध करो कि श्राद्ध में अनिवार्य है; प्रतिदिन नहीं। अन्य पूजन-अनुष्ठानों में अनावश्यक है यह सिद्ध करो क्योंकि श्राद्ध के अतिरिक्त अन्य किसी अवसर पर तो नहीं कराते हो। अरे सीधा कह रहा हूँ संध्या कराना ब्राह्मण का कार्य नहीं है, यजमान यदि सीखना चाहे तो ब्राह्मण सीखा सकते हैं किन्तु वो उपनयन काल के पश्चात् ही श्राद्ध कर्म में नहीं।

धूर्ताचार्य इसीलिये संबोधित किया जा रहा है कि कुछ धूर्तों ने स्वयं को अधिक बड़ा पंडित सिद्ध करने के लिये संध्या कराना आरम्भ कर दिया और बहुत सारे उसका अनुकरण भी करने लगे।

दूषित अन्न का प्रयोग

श्राद्ध में दूषित अन्न का प्रयोग भी चिंता का विषय है, श्राद्ध में जो कुछ भी भोज्य प्रयुक्त हों वह शुद्ध व्यक्ति द्वारा ही पकाये जाने चाहिये। वर्त्तमान में पूरी की तो बात छोड़िये बेंती (बेसन या आटे से बनायी जाती है) श्राद्धकर्त्ता की पत्नी को ही मुख्य रूप से बनाना चाहिये किन्तु ये भी हलवाई ही बनाता है। जो भी पाक होगा बिना स्नान किये नहीं हो सकता, स्नान करके ही बनाया जा सकता है एवं जिसका श्राद्ध है उसके परिवार व सपिण्डादि ही पका सकते हैं। श्राद्ध कर्म में पूरी की तो कोई आवश्यकता ही नहीं है फिर भी यदि देना ही हो तो घर में शुद्धतापूर्वक पकाया जाना चाहिये।

एकादशाह श्राद्ध आरम्भ करने से सम्बंधित महत्वपूर्ण जानकारी

  • एकादशाह को सूर्योदय पूर्व उठकर प्रेताशौच निवृत्ति के लिये मौशल स्नान करे ।
  • मौशल स्नान का तात्पर्य मूशलवत खड़ा रहकर चुपचाप स्नान करना है।
  • वास्तव में अशौच की निवृत्ति सूर्योदय काल (रात्र्यंत) में ही होती है अतः श्राद्धकर्त्ता के लिये मौशल स्नान आवश्यक होता है।
  • श्राद्ध भूमि का निरीक्षण करते हुए निर्धारित करे अर्थात आवश्यक लिपाई आदि के लिये निर्देश दे दे।
  • ब्राह्मण को निमंत्रण स्वयं दे या प्रतिनिधि द्वारा दे, लेकिन ब्राह्मण को निमंत्रण भी पवित्र होकर ही दे ।
  • श्राद्ध सामग्री आदि लेकर श्राद्ध स्थला जाकर पुनः वैध स्नान करे।
  • तत्पश्चात नित्यकर्म (संध्या-वन्दनादि) करे। संध्या-वंदनादि से ही सिद्ध हो जाता है कि प्रातःकाल न कि मध्याह्न में। वो धूर्ताचार्य हैं जो मध्याह्न में संध्या कराकर अपनी विद्वत्ता और शास्त्रनिष्ठा का पाखंड करते हैं।
  • कर्माधिकार सिद्ध्यर्थ प्रायश्चित्ताङ्ग गोदान करे। प्रायश्चित्ताङ्ग गोदान की विधि आगे दी गयी है।
  • श्राद्ध का आरम्भ कुतुप काल में करना चाहिये। कुतुप काल के सम्बन्ध में अधिक जानकारी छन्दोग एकादशाह विधि में दी गयी है।
  • दिन में कुल 15 मुहूर्त होते हैं इसलिये दिन (सूर्योदय से सूर्यास्त तक) का 15 भाग करके आठवें भाग में श्राद्ध आरम्भ करे।
  • कुतुप काल में श्राद्ध आरम्भ करने का तात्पर्य एकोद्दिष्ट आरम्भ करना है न की पाकारम्भ करना।
  • चूंकि कुतुप काल में एकोद्दिष्ट करना चाहिये इसलिये अन्य पाक-दानादि कार्य कुतुप काल से पूर्व कर ले।

प्रायश्चित्त गोदान

“प्रायश्चित्त के बिना कर्माधिकार सिद्ध नहीं होता।”

  • पवित्रीकरण करके तीन बार गाय की पुष्पाक्षत से पूजा करे – ॐ सवत्सगव्यै नमः ॥३॥ (एतावद्द्रव्यमूल्योपकल्पित)
  • फिर कुशब्राह्मण की पूजा करे – ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥३॥

फिर यह मंत्र पढ़े – ॐ यज्ञसाधनभूताया विश्वस्याऽघप्रणाशिनी । विश्वरूपधरो देवः प्रीयतामनया गवा ॥ प्रायश्चित्ते समुत्पन्ने निष्कृतिर्न कृता यदि । तस्य पापस्य शुद्धयर्थं घेनुमेतां ददामि ते ॥

गो निष्क्रय में थोड़ा ऊह करते हुये इस प्रकार पढ़े :

ॐ यज्ञसाधनभूताया विश्वस्याऽघप्रणाशिनी । विश्वरूपधरो देवः प्रीयतामनया गवा ॥
प्रायश्चित्ते समुत्पन्ने निष्कृतिर्न कृता यदि । तस्य पापस्य शुद्धयर्थं गोनिष्क्रयं ददामि ते ॥

आद्यश्राद्ध विधि

1 – शय्यादान विधि

  • शय्या पर तीन बार इस मंत्र से पुष्पाक्षत छींटे : ॐ सोपकरणशय्यायै नमः ॥३॥
  • त्रिकुशा (कुशब्राह्मण) की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे : ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥३॥
  • शय्या को कुशोदक से अभिसिक्त करे ।
  • पुनः तिल, जल लेकर इस मंत्र से त्रिकुशा (कुशब्राह्मण) पर दे : ॐ अद्य अशौचान्त द्वितीयेऽह्नि ………  गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य (…… गोत्रायाः मातुः ………. प्रेतायाः) स्वर्गकाम इमां सोपकरणां शय्यां विष्णु दैवताम् यथानामगोत्रायब्राह्मणाय अहं ददे ॥
  • पुनः त्रिकुश, तिल, जल, दक्षिणा लेकर दक्षिणा करे : ॐ अद्य कृतैतत्सोपकरण शय्यादान प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं यथानामगोत्रायब्राह्मणाय अहं ददे ॥

2 – काञ्चनपुरुषदान विधि

  • काञ्चनपुरुष पर तीन बार इस मंत्र से पुष्पाक्षत छिड़के : ॐ फलवस्त्रसमन्वित काञ्चनपुरुषाय नमः ॥३॥
  • त्रिकुशा (कुशब्राह्मण) की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे : ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥३॥
  • काञ्चनपुरुष को कुशोदक से अभिसिक्त करे ।
  • पुनः तिल, जल, त्रिकुशा (उत्सर्ग) : ॐ अद्य अशौचान्त द्वितीयेऽह्नि ………  गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य (…… गोत्रायाः मातुः ………. प्रेतायाः)  स्वर्गकाम इदं फलवस्त्र समन्वितकाञ्चनपुरुषं विष्णु दैवतम् यथानामगोत्रायब्राह्मणाय अहं ददे ॥
  • पुनः त्रिकुश, तिल, जल, दक्षिणा लेकर दक्षिणा करे : ॐ अद्य कृतैतत् फलवस्त्रसमन्वित काञ्चनपुरुष दान प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं यथानामगोत्रायब्राह्मणाय अहं ददे ॥

3 – गोदान विधि

  • तीन बार गाय की पुष्पाक्षत से पूजा करे : ॐ सोपकरण सवत्स कपिल गव्यै नमः ॥३॥
  • त्रिकुशा (कुशब्राह्मण) की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे : ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥३॥
  • गाय को कुशोदक से अभिसिक्त करे ।
  • उत्सर्ग : ॐ अद्य अशौचान्त द्वितीयेऽह्नि ………  गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य (…… गोत्रायाः मातुः ………. प्रेतायाः) स्वर्गप्राप्तिकाम इमां सोपकरणां सवत्सां कपिलां गां हेमशृंगीं रौप्यखुरां ताम्रपृष्ठां वस्त्रयुगच्छनां कांस्योपदोहां मुक्तांगुलभूषितां रुद्रदैवतां यथानामगोत्रायब्राह्मणाय अहं ददे ॥
  • पुनः त्रिकुश, तिल, जल, दक्षिणा लेकर दक्षिणा करे : ॐ अद्य कृतैतत् सोपकरण सवत्स कपिल गवीदान प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं यथानामगोत्रायब्राह्मणाय अहं ददे ॥

गोमूल्य दान विधि : यदि गोदान न कर सके तो गोमूल्य दान करे। गोमूल्य दान विधि इस प्रकार है।

  • तीन बार गोमूल्य की पुष्पाक्षत से पूजा करे : ॐ एतावत् द्रव्यमूल्यक सोपकरण सवत्स कपिल गव्यै नमः ॥३॥
  • त्रिकुशा (कुशब्राह्मण) की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे : ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥३॥
  • उत्सर्ग : : ॐ अद्य अशौचान्त द्वितीयेऽह्नि ………  गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य (…… गोत्रायाः मातुः ………. प्रेतायाः) स्वर्गप्राप्तिकाम एतावत् द्रव्यमूल्योपकल्पितां सोपकरणां सवत्सां कपिलां गां रुद्रदैवतां यथानामगोत्रायब्राह्मणाय अहं ददे ॥
  • पुनः त्रिकुश, तिल, जल लेकर दक्षिणा करे : ॐ अद्य कृतैतत् द्रव्यमूल्योपकल्पित सोपकरण सवत्स कपिल गवीदान प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं यथानामगोत्रायब्राह्मणाय अहं ददे ॥

4. छत्रदान :

आद्यश्राद्ध में आसन उत्सर्ग करने के बाद छत्र और उपानद् दान किया जाता है जिसका अपात्रक में खंडन होता है अस्तु आरम्भ में ही करे :

  • सव्य पूर्वाभिमुख होकर छाता पर तीन बार इस मंत्र से पुष्पाक्षत छिड़के : ॐ छत्राय नमः ॥३॥
  • त्रिकुशा (कुशब्राह्मण) की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे : ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥३॥
  • छाते को कुशोदक से अभिसिक्त करे ।
  • उत्सर्ग : : ॐ अद्य ………  गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य (…… गोत्रायाः मातुः ………. प्रेतायाः) आवरण काम इदं छत्रं उत्तानाङ्गिरो दैवतम् यथानामगोत्रायब्राह्मणाय अहं ददे ॥
  • पुनः त्रिकुश, तिल, जल, दक्षिणा लेकर दक्षिणा करे : ॐ अद्य कृतैतत् छत्र दान प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं यथानामगोत्रायब्राह्मणाय अहं ददे ॥

5. उपानद्दान :

  • सव्य पूर्वाभिमुख होकर उपानद् पर तीन बार इस मंत्र से पुष्पाक्षत छिड़के : ॐ उपानद्भ्यां नमः ॥३॥
  • त्रिकुशा (कुशब्राह्मण) की पुष्पाक्षत से तीन बार पूजा करे : ॐ ब्राह्मणाय नमः ॥३॥
  • उपानद् को कुशोदक से अभिसिक्त करे ।
  • उत्सर्ग : : ॐ अद्य ………  गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य (…… गोत्रायाः मातुः ………. प्रेतायाः)  तप्त-बालुकासि-कण्टकित-भूदुर्ग-सन्तरण काम इमे उपानहौ उत्तानाङ्गिरो दैवते यथानामगोत्रायब्राह्मणाय अहं ददे ॥
  • पुनः त्रिकुश, तिल, जल, दक्षिणा लेकर दक्षिणा करे : ॐ अद्य कृतैतत् उपानद्दान प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यकं हिरण्यं अग्नि दैवतं यथानामगोत्रायब्राह्मणाय अहं ददे ॥

निःसंदेह इस प्रकार से दान करना अशास्त्रज्ञ स्वघोषित पंडितों को यह स्वीकारना दुष्कर है किन्तु विवेकवान विद्वद्जन गंभीरता से वास्तविकता को समझेंगे। अन्य वस्तुओं के दान विधि के लिये एक स्वतंत्र आलेख प्रकाशित किया गया है : दान विधि और मंत्र

एकोद्दिष्ट – आद्यश्राद्ध – महैकोद्दिष्ट

निर्देश :

  1. जिस क्रिया में स.द.त्रि. अंकित किया गया है उसका तात्पर्य है – सव्य, दक्षिणाभिमुख, त्रिकुशहस्त।
  2. जिस क्रिया में स.पू.त्रि. अंकित किया गया है उसका तात्पर्य है – सव्य, पूर्वाभिमुख, त्रिकुशहस्त।
  3. जिस क्रिया में अ.द.त्रि. अंकित किया गया है उसका तात्पर्य है – अपसव्य, दक्षिणाभिमुख, त्रिकुशहस्त।
  4. जिस क्रिया में अ.द.मो. अंकित किया गया है उसका तात्पर्य है – अपसव्य, दक्षिणाभिमुख, मोटकहस्त।

सव्य-अपसव्य क्रम और त्रिकुशा-मोड़ा आदि के सम्बन्ध में अन्य पद्धतियों में किञ्चित अंतर संभव है।

सर्वप्रथम शुद्धिकरण करे, तीन बार आचमन कर कुशादि धारण करते हुए आत्मशुद्धि करे :

यदि पाककर्त्ता द्वारा पाककर्म हुआ हो तो श्राद्धकर्त्ता पाककर्त्ता से पूछे “सिद्धम्” और पाककर्त्ता कहे “ॐ सिद्धम्” ॥ यदि पाककर्ता न हो तो पूछने की आवश्यकता नहीं है।

पवित्रीकरण मंत्र (सव्य-पूर्वाभिमुख) : ॐ अपवित्रः पवित्रोऽ वा सर्वावस्थांगतोऽपि वा यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याऽभ्यन्तरः शुचिः पुण्डरीकाक्षः पुनातु । ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु ॥

एकादशाह के दिन दो बार संकल्प किया जाता है प्रथम संकल्प षोडश श्राद्ध का और द्वितीय संकल्प आद्यश्राद्ध का। पूर्वाभिमुख-सव्य-त्रिकुशा-तिल-जल लेकर पहले षोडश-श्राद्ध का संकल्प करे :-

संकल्प कर तिल जलादि भूमि पर गिराये त्रिकुशा सहित। पुनः त्रिकुशा-तिल-जल आदि लेकर आद्यश्राद्ध का संकल्प करे :

आद्य श्राद्ध संकल्प (स.पू.त्रि.): ॐ अद्य …….… गोत्रस्य …….. पितुः ……. प्रेतस्य प्रेतत्वविमुक्ति हेतु षोडश (सप्तदश) श्राद्धान्तर्गत आद्य श्राद्धं अहं करिष्ये ॥

  • संकल्प कर तिल जलादि भूमि पर गिराये त्रिकुशा सहित।
  • त्रिकुशा लेकर तीन बार गायत्री मंत्र जप करे। तीन बार देवताभ्यः मंत्र पढ़े (स.पू.त्रि.) : ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च । नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः ॥३॥

अर्घ्य स्थापन – अर्घ्यपात्र में दक्षिणाग्र पवित्री देकर, शन्नो देवी मंत्र से जल दे, तिलोऽसि मंत्र से तिल दे : फिर बिना मंत्र के पुष्प-चंदन भी दे :

  • जल (अ.द.त्रि.) : ॐ शन्नो देवीरभिष्टय ऽआपो भवन्तु पीतये शंय्योरभि स्रवन्तुनः॥ अर्घ्य पात्र में जल दे।
  • तिल (अ.द.त्रि.) : ॐ तिलोऽसि सोम देवत्यो गोसवो देवनिर्मितः। प्रत्नद्भिः पृक्त: स्वधया पितृन् लोकान् प्रीणाहि नः स्वाहा ॥

अर्घ्य पात्र में जल-तिल देकर बिना मंत्र के पुष्प-चंदन भी दे। अर्घ्य पात्र को बांये हाथ में लेकर पवित्री निकाल कर भोजन पात्र पर उत्तराग्र रखे, अन्य जल से सिक्त करे। दांये हाथ से अर्घ्य पात्र को ढंककर अगले मंत्रों से अभिमन्त्रण, उत्सर्जन और न्युब्जीकरण करे : –

  • अर्घ्याभिमंत्रन (अ.द.त्रि.) : ॐ या दिव्या आपः पयसा सम्बभूबुर्या आंतरिक्षा उत पार्थीवीर्या:। हिरण्यवर्णा याज्ञियास्ता न आपः शिवा: स ᳪ स्योना: सुहवा भवन्तु ॥ फिर दाहिने हाथ में मोटक, तिल, जल लेकर अर्घ्योत्सर्ग करे :
  • अर्घ्योत्सर्ग (अ.द.मो.) : ॐ अद्य ……… गोत्र पितः …… प्रेत इदमर्घ्यं ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥ फिर अर्घपात्र दाहिने हाथ में लेकर पूर्वसिक्त कुशा पर पितृतीर्थ से दे ।
  • न्युब्जीकरन (अ.द.मो.) : ॐ पित्रे स्थानमसि ॥ भोजन पात्रस्थित कुशा को पुनः अर्घ्य पात्र में रखकर आसन के वाम (पश्चिम) भाग में अधोमुखी कर दे। यह अधोमुखी पूड़ा दक्षिणा देने तक न हिले ऐसी व्यवस्था रखे।
  • फिर श्राद्ध भूमि पर तिल बिखेर कर भूतल पर (दोनों हाथ गट्टे-से-गट्टे को मिलाकर रखते हुये) प्रेत का आवाहन करे (व्यवहार में इसी समय प्रेत द्वारा उपभोग किया गया उपयोगी और प्रिय वस्तु भी रखा जाता है जिससे प्रेत आकृष्ट हो सके) : ॐ इहलोकं परित्यज्य गतोऽसि परमां गतिं ॥

अ.द.मो. भोजन पात्र और आसन को अपसव्य/अप्रदक्षिण क्रम से जल से मंडल करे (यह ध्यान रखे कि आसन और भोजन पात्र के मध्य अन्य सामग्रियां न रहे)। वाम भाग अर्थात वेदी के पूर्व में भूस्वामि का अन्न देकर अगले मंत्र से उत्सर्ग करे :-

अन्नादि परोसकर अधोमुखी दाहिने हाथ से प्रेतान्न का स्पर्श कर (अथवा मधु दे) मधुव्वाता मंत्र पढ़े , दाहिने हाथ के नीचे अधोमुखी बांया हाथ लगाते हुए पृथिवी ते …… आदि मन्त्र पढ़े। (भोजनपात्र में तिल न रहे इसका ध्यान रखे अर्थात भोजनपात्र की सफाई कर ले) अवगाहन करने के लिये अन्य पूड़े में सतिल-जल-घृत (जलपात्र (पूड़े) में जल रखकर, घृतपात्र (पूड़ा) में घृत देकर) रखे :

  • ॐ पृथिवी ते पात्रं द्यौरपिधानं ब्राह्मणस्य मुखे अमृते ऽअमृतं जुहोमि स्वाहा ॥
  • ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् समूढ़मस्य पा ᳪ सुरे ॥
  • ॐ कृष्ण कव्यमिदं रक्षमदियं ॥

बांये हाथ को अन्न में लगाकर रखते हुए दाहिने हाथ के अंगूठे से क्रमशः अन्न, जल, घी और अन्न का स्पर्श अगले मन्त्र से करे; बहुत जगह व्यवहार में यह नहीं देखा जाता अपितु दीप वाले घी का ही स्पर्श किया जाता है जो अनुचित है :-

सव्य-पूर्वाभिमुख गायत्री मंत्र से संकल्प वाली त्रिकुशा आसन के नीचे रखे (कुशाभाव में थोड़ा सा तोड़कर रखा जाता है, यदि कुशाभाव न हो तो विकल्प न ग्रहण करें)। पुनः अपसव्य-दक्षिणाभिमुख “मधुमती ऋचा” (पूरी ऋचा) पाठ करे । सव्य होकर रक्षोघ्नसूक्तादि पाठ अथवा श्रवण करे :

ॐ आशुः शिषाणो वृषभो न भीमो घनाघनः क्षोभनश्चर्षनिनां ।
संक्रदनो निमिष एकवीरः शत ᳪ सेना अजयत्साकमिन्द्रः ॥
ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शङ्कराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च ॥
ॐ नमस्तुभ्यं विरूपाक्ष नमस्तेनेक चक्षुषे । नमः पिनाकहस्ताय वज्रहस्ताय वै नमः ॥
ॐ सप्तव्याधा दशार्णेषु मृगाः कालञ्जरे गिरौ । चक्रवाकाः शरद्वीपे हन्साः सरसि मानसे ॥
तेऽपि जाताः कुरुक्षेत्रे ब्राह्मणा वेदपारगाः । प्रस्थिता दूरमध्यानौ यूयं तेभ्योवसीदथ ॥
ॐ रुची रुची रुचिः ॥ पाठ करे।

विकिरदान : पिंडवेदी के पश्चिम भाग में एक त्रिकुशा रख कर जल से सिक्त कर दे, एक पुरे में अन्नादि लेकर मधुमती ऋचा से मधु देकर बांये हाथ के पितृतीर्थ से मोड़ा द्वारा त्रिकुशा पर अगले मन्त्र से दे :-

अंगारभ्रमण : पिंडवेदी के रेखा पर थोड़ा आग देकर मोड़ा से घुमाते हुए दक्षिण में गिरा दे :-

स.पू.त्रि. – ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः ॥३॥

अत्रावन (अ.द.मो.) : ॐ अद्य …………. गोत्र पितः ……… प्रेत पिण्डस्थाने अत्रावने निक्ष्व ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

अत्रावन का उत्सर्ग करते हुए पुरे का आधा जल पिंडवेदी के कुशाओं पर गिरावे और आधा प्रत्यवन वास्ते रखे। सव्य-पूर्वाभिमुख दो बार आचमन करके पिण्ड निर्माण करे। पिण्ड निर्माण उसी समय करे जब उत्सर्ग करना हो न कि पहले, पिण्ड निर्माण करके हाथ धोये बिना ही पिण्ड का उत्सर्ग करे अर्थात पिण्डनिर्माण करके उत्सर्ग ही करे। पिण्ड निर्माण करके बांये हाथ में पिण्ड लेकर उत्सर्ग करे :-

आद्य श्राद्ध पिंडदान

पिण्ड (अ.द.मो.) : ॐ अद्य …………. गोत्र पितः ……… प्रेत एष पिण्डः ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

पिण्ड दाहिने हाथ में लेकर पितृतीर्थ से वेदी के कुशाओं पर रखे। पिंडतलस्थ कुशाओं में हाथ पोछ ले। अब हाथ धोया जाना चाहिये…

सव्य-पूर्वाभिमुख दो बार आचमन करके हरिस्मरण करे। फिर दक्षिणाभिमुख हो जाये

  1. ॐ अत्र पितरोमादयध्वं यथाभाग मा वृषादयध्वम् ॥ सूर्य स्वरूप पिता का ध्यान करते हुए उत्तर से श्वास ले।
  2. ॐ अमीमदन्त पितरो यथाभाग मा वृषायिषत ॥ पश्चिम की ओर श्वास छोड़े।

फिर अवनेजन पूड़ा शेष जल सहित बांयें हाथ में ले, दाहिने हाथ में तिल-जल-मोड़ा लेकर प्रत्यवन उत्सर्ग करे :

पिण्डपूजन (अ.द.मो.) : ॐ नमो वः पितरो रसाय नमो वः पितरो शोषाय नमो वः पितरो जीवाय नमो वः पितरः स्वधायै नमो वः पितरो घोराय नमो वः पितरो मन्यवे नमो वः पितरः पितरो नमो वो गृहान्नः पितरो दत्त सतो वः पितरो द्वेष्म ॥ ॐ एतद् वः पितरो वासः ॥ दोनों हाथों से (बांया हाथ आगे, दाहिना पीछे) पकड़ कर सूता पिण्ड पर दे। फिर तिल, जल लेकर वस्त्रोत्सर्ग करे :

वस्त्रोत्सर्ग (अ.द.मो.) : ॐ अद्य ………… गोत्र पितः ………… प्रेत आद्यश्राद्धपिण्डे एतद्वास्ते मया दीयते तवोपतिष्ठताम् ॥

पान, पुष्प, चन्दन, द्रव्यादि भी चुपचाप पिण्ड पर चढ़ा दे। पिंडशेषान्न पिंड के चारों और अपसव्य क्रम से बिखेड़ दे ।

  • ॐ शिवा: आपः सन्तु ॥ भोजनपात्र पर जल दे।
  • ॐ सौमनस्यमस्तु ॥ भोजनपात्र पर फूल दे।
  • ॐ अक्षतंचारिष्टमस्तु ॥ भोजनपात्र पर अक्षत दे।

फिर शान्त्युदक कल्पित करके अर्थात एक पूड़े में तिल-जल-पुष्प-चंदन आदि लेकर भूमि पर रखे। दोनों हाथों को गट्टे-से-गट्टा मिलाकर भूमि पर रखकर भूमि को प्रणाम करते हुये अगला मंत्र पढ़े – ॐ नमो नमो मेदिनी लोकधात्रि उर्वि महि शैलगिरिधारिणी धरणि नमः। धरणि काश्यपि जगत्प्रतिष्ठे वसुधे नमोऽस्तु वैष्णवी भूतधात्री। नमोऽस्तु ते सर्वरसप्रतिष्ठे निवापनावीचि नमो नमोस्तु ते॥

तिल, मधु, घृत मिश्रित जल (अक्षय्योदक) पूड़े से पिण्ड पर दे।

अपसव्य-दक्षिणाभिमुख-पवित्रीहस्त पिण्डस्थ सूत्रादि हटा दे। पिण्ड पर त्रिकुशा रख कर जल या दुग्धधारा दे :-

वारिधारा (अ.द.मो.) : ॐ ऊर्जं वहन्तीरमृतं घृतं पयः कीलालं परिश्रुतम् । स्वधास्थ तर्पयत् मे पितृन् ॥

थोड़ा नम्र होकर पिण्ड को सूँघ ले और उठाकर फिर रख दे। पिण्ड के नीचे वाले कुशों को निकाल कर और वेदी पर भ्रमण किया गया अंगार आग में दे दे। अर्घ्यपात्र को उत्तान कर दे। मोड़ा, तिल, जल, द्रव्यादि लेकर दक्षिणा करे :-

दक्षिणा (अ.द.मो.) : ॐ अद्य …… गोत्रस्य पितुः ……… प्रेतस्य कृतैतत् आद्य श्राद्ध प्रतिष्ठार्थं एतावत् द्रव्यमूल्यक रजतं चन्द्रदैवतं यथानामगोत्रायब्राह्मणाय अहं ददे ॥

  • पू.स.त्रि. होकर एक अन्य त्रिकुशा भूमि पर रखकर जौ सहित जल दे : ॐ अग्निमुखा देवास्तृप्यन्ताम्॥
  • पाकपात्र का शेष अन्न से भूतबलि प्रदान कर दे – एक पूड़े में अन्न लेकर पुष्प-जल आदि अगले मंत्र से छिड़के – ॐ भूतेभ्यः एष बलिर्नमः॥
  • दो बार आचमन कर तीन बार देवताभ्यः मन्त्र पढ़े : ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः ॥३॥
  • द.अप. दीप का किसी पत्रादि से आच्छादन कर दे। सव्य-पूर्वाभिमुख दो बार आचमन कर अगला मन्त्र पढे :-

ॐ प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेत्ताध्वरेषुयत् । स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्णं स्यादिति श्रुतिः ॥

॥ ॐ विष्णुर्विष्णुर्हरिर्हरिः ॥

पिण्डवेदि को कनिष्ठिका अङ्गुलि से थोडा तोड़ दे। सूर्य भगवान को प्रणाम कर ले। श्राद्ध की सभी उपयोगी वस्तुयें ब्राह्मण को दे, पत्र-पुष्पादि जल में प्रवाहित करे।

॥ इति पं० दिगम्बर झा सुसम्पादितं “करुणामयीटीकाऽलंकृतं” वाजसनेयिनां संशोधितापात्रकाद्यश्राद्धविधिः ॥

निष्कर्ष (Conclusion)

इस संशोधित विधि का उद्देश्य अव्यावहारिक विधियों के स्थान पर विशुद्ध शास्त्रीय सिद्धांतों की स्थापना करना है। अपात्रक श्राद्ध में महापात्र की स्थिति, दान का सही काल और मध्याह्न व्यापिनी तिथि का महत्त्व समझना प्रत्येक विवेकवान आचार्य के लिए अनिवार्य है। यह आलेख स्पष्ट करता है कि जब तक कर्मकांड में शास्त्रोक्त नियमों का पालन नहीं होगा, तब तक आत्मकल्याण और पितृ-तृप्ति संभव नहीं है। सुधार की यह प्रक्रिया परवर्ती आचार्यों के लिए मार्गदर्शिका सिद्ध होगी। आद्य श्राद्ध के उपरोक्त विश्लेषण बहुत ही महत्वपूर्ण हैं एवं आगे स्त्री आद्यश्राद्ध विधि में और आगे बढ़ाया जायेगा।

विद्वद्जनों से विनम्र आग्रह है कि यह आपके ऊपर बाध्यकारी न होकर शास्त्रीय दृष्टिकोण से समीक्षा पूर्वक त्रुटियों के प्रति ध्यानाकर्षण पूर्वक शास्त्रोचित होने पर ग्राह्य है। धूर्ताचार्य, मूर्खाचार्य आदि कहकर उलाहना शास्त्रनिष्ठ विद्वद्जनों की नहीं की गयी है अपितु धूर्तों की करी गई है जो अपण्डित होकर भी पाण्डित्य के अहंकार से भरे हैं, किसी भी शास्त्रोचित विषय पर विचार-विमर्श करने में तो अक्षम हैं ही, समझने का भी सामर्थ्य नहीं रखते किन्तु शास्त्र से सिद्ध तथ्यों को भी अस्वीकार करते हुये अहंकार तृप्ति करते हैं।

यदि उपरोक्त वाजसनेयी आद्यश्राद्ध में कोई त्रुटि दृष्टिगत हो तो अवश्य अवगत करें।

एकादशाह श्राद्ध विधि pdf और सुगम श्राद्ध विधि डाउनलोड करने के लिये यहां क्लिक करें।

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

अस्वीकरण: इस आलेख में प्रस्तुत संशोधित विधि शास्त्रीय विमर्श और प्राचीन धर्मग्रंथों के गहन अध्ययन पर आधारित है। प्रचलित व्यावहारिक विधियों से भिन्नता होने की स्थिति में विद्वान पाठक शास्त्र और शास्त्रीय विवेक का आश्रय लें। यह सामग्री धार्मिक जागरूकता और श्राद्ध की विसंगतियों का निवारण करने के उद्देश्य से प्रकाशित की गई है। व्यक्तिगत प्रयोग से पूर्व योग्य शास्त्रज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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