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“सब ठीक है” में छुपी सबसे बड़ी त्रुटि और मनमुखी उत्तर का दुष्परिणाम

"सब ठीक है" में छुपी सबसे बड़ी त्रुटि और मनमुखी उत्तर का दुष्परिणाम "सब ठीक है" में छुपी सबसे बड़ी त्रुटि और मनमुखी उत्तर का दुष्परिणाम

“प्रतिष्ठा के भय से अज्ञात विषय पर भी ‘मनमुखी निर्णय’ देना स्वयं ब्रह्मघात के पाप से लिप्त होना है।”

सब ठीक है कहने से प्रथम भाव कुशल-मंगल का उत्तर प्रतीत होता है, कोई प्रश्नवाचक रूप से प्रश्न भी करते हैं तो कोई उत्तर भी देते हैं। इसमें कुछ और जुड़ जाये “भगवान जो करते हैं सब ठीक ही करते हैं” और इसी का सन्दर्भ होने पर ऐसा रूपान्तरण भी हो सकता है – “जो होता है सब ठीक है” और इसमें सन्दर्भ होने पर कोई आपत्ति नहीं हो सकती, एक भक्त भगवान के विषय में ऐसा ही कहेगा। किन्तु यही जब कर्मकांड के विषय में प्रयोग किया जायेगा तो क्या उचित कहा जायेगा ? विषय गंभीर है और विमर्श में इसका जो स्वरूप देखने को मिलेगा वह कल्पना से पड़े है।

“सब ठीक है” में छुपी सबसे बड़ी त्रुटि और मनमुखी उत्तर का दुष्परिणाम

यह वक्तव्य अनेक संदर्भ में प्रयुक्त होता है और संदर्भानुसार उचित और अनुचित भी होता है। जैसे एक भक्त ईश्वरकृत विधान में कहे तो उचित है, किन्तु एक विद्वान किसी शास्त्रविरुद्ध व्यवहार आदि के संदर्भ में कहें तो अनुचित है, वास्तव में वो विद्वान नहीं हैं यह सिद्ध करता है।

यदि स्पष्टरूप से कहा जाय तो किसी कर्मकाण्ड-धर्माचरण की विसंगतियों पर विमर्श होने के पश्चात् भी यदि कोई ब्राह्मण ऐसा कहें कि “जो-जैसे हो रहा है सब ठीक है” तो इसका तात्पर्य है वो उस विषय का विचार करने में अक्षम हैं और अपनी अक्षमता को आवरण प्रदान करते हैं। जो-जैसे हो रहा है सब ठीक ही हो है तो फिर किसी विषय का विचार करने की आवश्यकता ही क्या होती है?

औचित्य: ये ब्राह्मण का दायित्व होता है कि वो शास्त्रानुसार उचित-अनुचित सिद्ध करें और आवश्यक होने पर निर्णय प्रदान करें । जिसका दायित्व है वह मुंह फेर ले, दायित्व निर्वहन न करे तो दोष भी उत्पन्न होता है। इसलिए ब्राह्मणों को सदैव ज्ञानयज्ञ करते ही रहना चाहिए अर्थात ज्ञान का आदान-प्रदान।

सब ठीक है
सब ठीक है

“ब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः” ये परमावस्था तो है, परम लक्ष्य प्राप्ति है किन्तु उसका मार्ग सरल नहीं है। ब्राह्मण के लिये यह आत्मकल्याण का दूसरा मार्ग है जो सरल है, सुगम है और इस दायित्व का निर्वहन करे ये अनिवार्य है। अर्थात् कभी भी “जो-जैसे हो रहा है सब ठीक है” ऐसा न कहे। जहां सबकुछ उचित हो भी रहा है तो भी समीक्षा की जा सकती है। वास्तव में ऐसा वक्तव्य एक अल्पज्ञ ही देता है, यह दुर्बुद्धि की उपज होती है। नाना प्रकार के दोषों का यह फल होता है जो नरकगामी बनाने वाला है।

संभव है आपने भी कई बार भूलवश ऐसा प्रयोग किया हो, आत्मचिंतन करें क्या आपने जिस विषय में यह कहा था उसके उचित पक्ष का प्रामाणिक उत्तर आपके पास था ?

आप स्वयं का आत्ममंथन करेंगे तब स्पष्ट हो जायेगा कि चूंकि ज्ञान नहीं था इसलिए ऐसा बोलना पड़ा, किन्तु प्रश्न है कि यदि ज्ञात नहीं था तो ये कहना था न कि मुझे ज्ञात नहीं, ज्ञात करने का प्रयास करेंगे। ये वक्तव्य आया क्यों कि “सब ठीक है“ ? यह दोष का परिणाम है जो पाप में प्रवृत्त करता है, सब ठीक है कहने में आपने उचित को तो उचित कहा, किन्तु अनुचित को भी उचित कहा और यहां उस अनुचित के पाप का भागी बनते हैं, अनुचित को उचित कहना निश्चितरूपेण पतनोन्मुख करने वाला है।

उदाहरण 1. : सभी जान रहे हैं कि कर्मकाण्ड का स्वरूप पूर्णतः विकृत हो गया है, हवन विधि का ज्ञान नहीं है किन्तु उपनयन, विवाह, वृषोत्सर्ग सबकुछ करा रहे हैं । कदाचित ही कहीं कोई हवन उचित विधि से सम्पन्न हो रहा है। किन्तु इस विषय की चर्चा करके देखें अंत में सभी बस यही निष्कर्ष देंगे –

“जहां-जो-जैसे हो रहा है सब ठीक ही हो रहा है”

कारण कि वो स्वयं भी हवनविधान से अनभिज्ञ ही हैं । यहां दोष समझें जहां जितना जो विधि-विरुद्ध अशास्त्रीय आसुरी हवन हो रहा है उसने सबको उचित कह दिया। ये विभिन्न दोषों का प्रतिफल है कि उसकी प्रवृत्ति उचित के अन्वेषण में नहीं हो पाई अपितु अनुचित को उचित कहने का अपराध कर बैठा ।

उदाहरण 2. : अधिकमास का विवाद विगत एक वर्षों से (२०२५ – २०२६) में चलता रहा और आगे भी जब अधिकमास आएगा तो चलेगा ही। अधिकमास पड़ने पर कब तक षोडश श्राद्ध होगा और कबसे सप्तदश एक विवाद इसको लेकर रहता है एवं दूसरा अधिमास में मृत्यु होने पर भी होता है कि कब तक या कब से ? विवाद करने वाले दोनों ही पक्ष कुछ सिद्धि नहीं करते अपितु केवल एक-दो वचन को लेकर अपने दुराग्रह पर अड़े रहते हैं।

तीसरा व्यक्ति कह देगा “जहां-जो-जैसा हो रहा है सब ठीक हो रहा है” और वह इसमें दोष का भागी बन जायेगा। कारण कि सब ठीक नहीं हो रहा है कुछ उचित भी हो रहा है और कुछ अनुचित भी हो रहा है, एक पक्ष सही है तो दूसरा पक्ष गलत है अथवा दूसरा पक्ष यदि सही है तो पहला पक्ष ही गलत है। सब ठीक कहने मात्र से गलत को भी ठीक कह दिया गया और दोष उत्पन्न होगा। अब एक बड़ा उदाहरण दिया जायेगा व्रात्य विषयक …

कुछ विषय ऐसे भी होते हैं जहां सब ठीक होता है, इसमें वो विषय आते हैं जिसके लिये शास्त्र में ही दो या अधिक पक्ष हो। जिसे देश में जो पक्ष ग्रहण किया गया वहां वह सही है इसका तात्पर्य यह नहीं होगा कि यदि दूसरे देश में दूसरा पक्ष ग्रहण किया गया तो वह गलत है वो इसलिये की शास्त्र से ही है। इस प्रकार ऐसे विषयों में सब ठीक है ऐसा कहा जा सकता है।

यहां मनमुखी विचार का होना महत्वपूर्ण है शास्त्रानुसार विचार न करके मनमुखी विचार करना कि किसे सही कहें किसे गलत – “को बड़ छोट कहत अपराधु” ऐसा विचार ही अनुचित है। अधिकांशतः सामान्य नियम ब्राह्मण और गुरु के विषय में मान्य ही नहीं होते, जैसे पापी से संसर्ग होना दर्शन-वार्तालाप आदि, पापश्रवण। यदि उनपर यह नियम यथावत जैसे सामान्य लोगों पर प्रभावी होता है हो तो वो किस पापी से वार्तालाप करेंगे, किसका पाप श्रवण करेंगे।

यदि संसर्ग दर्शन, वार्तालाप, श्रवण आदि न हो तो प्रायश्चित्त का विचार कैसे करेंगे। यदि प्रायश्चित्त में कष्ट देने का भाव ग्रहण करें तो भी कैसे देंगे क्योंकि यदि किसी को प्रायश्चित्त प्रदान किया जायेगा तो वह करेगा और इसमें उसको कष्ट होगा तो फिर उस कष्ट का दोष गुरु-विद्वान ब्राह्मण को होगा अथवा नहीं। यहां विषय यही है कि इसका विचार ही नहीं किया जायेगा क्योंकि शास्त्र से यह अधिकार ब्राह्मण-गुरु को प्राप्त है अर्थात अधिकृत हैं।

वर्त्तमान में व्रात्य दोष और निवारण

व्रात्य दोष की व्यापक चर्चा कभी नहीं होती किन्तु इतनी चर्चा और इस प्रकार से की जाती है कि कुछ लोगों दुकान चल पड़ती है। व्रात्य विषयक एक प्रामाणिक चर्चा पूर्वकृत है और उसकी पुनरावृत्ति अनपेक्षित है जो अवलोकन करना चाहें यहां क्लिक करके अवलोकन कर सकते हैं, चर्चा से सम्बंधित प्रमाण भी वहां उपलब्ध है।

व्रात्य दोष के विषय में सबसे पहली बात यह है कि आज भ्रामक चर्चा भी होने लगी है किन्तु दूसरा पहलू यह भी है कि सामान्य कर्मकांडी व्रात्य दोष के बारे में जानते भी नहीं हैं और नहीं जानने का दुष्परिणाम यह है कि कुछ लोग अपनी दुकान चलाते हैं।

दुकान ऐसे कि वास्तविक परिहार क्या है और कैसे किया जा सकता है यह वो भी नहीं जानते, वो भी वैकल्पिक मार्ग ही बताते हैं एवं उस वैकल्पिक मार्ग से अधिक उत्तम मार्ग मिथिला में परम्परा से ही स्थापित है।

वर्त्तमान में व्रात्य दोष और निवारण
वर्त्तमान में व्रात्य दोष और निवारण

अन्य क्षेत्रों की तो बात भिन्न हो सकती है किन्तु मिथिला के मनीषियों ने ऐसा ही विधान किया है जिससे वर्त्तमान में व्रात्य दोष और अनाश्रमी का निवारण हो जाता है। व्रात्य दोष के विषय में ऐसा बताया जाता है कि जिसका विधिपूर्वक उपनयन हुआ भी (उस परिहार विधान के साथ जो पूर्वाचार्यों ने स्थापित किया) तो भी उसे व्रात्य कहकर ही भ्रमित किया जाता है और यदि ऐसी दुकानों पर चले जायें तो वो निर्दोष कर देते हैं, संभवतः ऐसी कोई सिद्धि हो, किन्तु जहां तक मुझे ज्ञात है व्रात्य दोष से मुक्त करने के लिये किसी सिद्धि की आवश्यकता ही नहीं होती।

व्रात्य के पक्ष में कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं को समझना आवश्यक है जिसको समझने से भ्रमों का निवारण हो जायेगा । हमारा उद्देश्य संकट उत्पन्न न करके समाधान ढूंढना है किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं कि व्रात्यता को प्रोत्साहित किया जाय अपितु सम्मार्जन परक है, अगली पीढ़ियां व्रात्य न हो इसके लिये सजग रहना आवश्यक है :

  • वर्त्तमान काल में ब्राह्मणवर्ग भी अपने बच्चे को इंजिनियर-डॉक्टर आदि ही बनाना चाहता है, मास्टर बने या सिपाही या चपरासी किन्तु नौकरी चाहिये। व्रात्यता विषयक ज्ञान विलुप्त है और यदि उपलब्ध भी है तो उसमें रूचि नहीं, स्वेच्छार प्रवृत्ति के कारण से। कुछ यदि करते हैं अर्थात सजग हैं तो वो अब अपवाद में गण्य हैं।
  • व्रात्य हेतु एक पक्ष जो है वो उपनयन, अध्ययन (वेद), विवाह आदि का भी निषेध करता है जो पूर्व युगों में जब जनसामान्य धर्मनिष्ठ होते थे तब के लिये ही था।
  • व्रात्य हेतु द्वितीय पक्ष प्रायश्चित्त पूर्वक उपनयनादि करने का है और यह पक्ष अधिक प्रबल है क्योंकि उपनयन के उपरांत ही विवाह होगा और विवाहोपरांत ही संतान होगी।
  • कलयुग में प्रायश्चित्त का भी लोप होगा ऐसा लिखा है और वर्त्तमान में लुप्तप्राय है। यह कलयुग प्रभाव है।
  • मिथिला के मनीषी “नीर-क्षीर-विवेक” युक्त होते थे और इसका ही परिणाम है कि हम आज भले ही समझ भी नहीं पा रहे हों किन्तु युगानुकूल मार्ग प्रशस्त कर दिया गया था।
  • मिथिला के उपनयन विधान में उक्त उपनयन कालिक विधान के अतिरिक्त एक अन्य “भिखनि” का व्यवहार है जो अयाचित का रूपांतरण है। सशिखा केशवपन भी प्रायश्चित्त विधान से ही व्रात्यपरक है और पुनः तृतीय दिन चतुर्थी का विधान नहीं व्यवहार है जो व्रात्य से ही सम्बंधित है। इसमें प्रायश्चित्त विधान वैकल्पिक रूप से अथवा प्रतीकात्मक समाहित किया गया है। किन्तु उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि प्रत्याम्नाय का आश्रय ग्रहण करना चाहिये।
  • वर्त्तमान काल में अधिकांशतः किसी न किसी प्रकार यदि वो व्रात्य न हों तो अन्यान्य दोष से युक्त होते ही हैं (जैसे वृषलीपति) अस्तु विचार सभी दोष का होना चाहिये। अधिकांशतः अयोग्य सिद्ध होने से दो प्रकार का संकट उत्पन्न होगा प्रथम उनके वृत्ति की समस्या और द्वितीय जनसामान्य के कर्म का लोप। ये संकट उत्पन्न न हो इसका भी विचार करना ही होगा, प्रायश्चित्त भी बिना विचार किये जो है वही नहीं दिया जा सकता यह भी शास्त्रीय विधान ही है अर्थात उसमें भी आवश्यकतानुसार अंतर किया जा सकता है।
  • कुछ लोग बड़े स्तरों पर व्रात्य दोष की चर्चा करते हैं वो स्वार्थ के वशीभूत होकर करते हैं।
  • जिसका उपनयन उपरोक्त विधि से हो गया उसकी व्रात्यता भंग हो गयी ऐसा ही स्वीकारना बाध्यकारी है। यदि विचारणीय है तो वर्त्तमान में जो व्रात्य है उसके उपनयन विधान पर और आगे व्रात्य न हो इस विषय पर।

उक्त विषय का नीर-क्षीर-विवेक से रहित होकर चिंतन नहीं किया जा सकता, इस प्रकार विचार करना ही होगा कि संकट भी उत्पन्न न हो और समाधान भी प्राप्त हो। कुछ अन्य शंका भी उत्पन्न होना अनिवार्य है तभी तो यह सिद्ध होगा विषय को भलीभांति समझा गया है, उन शंकाओं के निवारण का भी प्रयास किया जायेगा।

तत्काल विषय से भिन्न निरर्थक कोई भी चर्चा न की जाय यह आवश्यक है। जहां शंका उत्पन्न हो प्रकट किया जा सकता है और परिस्थिति के अनुकूल निर्णय लेने का विद्वानों को अधिकार होता है इसका प्रमाण आगे प्रस्तुत किया जायेगा किन्तु यह मैं निर्णय नहीं प्रदान कर रहा हूँ, विचार मात्र है। विषय से सम्बंधित एक अन्य समूह में ऐसा उपयोगी संदेश प्राप्त हुआ है :

वैदिक मंत्र ब्राह्मणों की निधि है, उन मंत्रों का रहस्य “कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः” की उक्ति से उत्पन्न ब्राह्मणों के मस्तिष्क ही जानते हैं, अनंत रश्मिवान सूर्य से सोमपान करने वाले चंद्रमा सबसे पहले ब्राह्मण है, जिनके गर्भ में भगवती उमा रूप अग्नि विद्यमान होकर वे चारों ओर से महान सोम का निरंतर पान करते हुए इस जगत को शीतलता प्रदान कर रहे हैं, ब्रह्माधिपति चंद्रमा विद्यमान नहीं होते तो तप्त सूरज संपूर्ण पृथ्वी को कभी जला डालता।

संपूर्ण वैदिक मंत्रों के गर्भ में अग्निदेव विराजमान होकर ब्राह्मण उन वैदिक मंत्रों से यंत्रतंत्रात्मक जगत का निर्माण कर रहे हैं। मगर सूर्य मंडल के श्वेत वाराह कल्प के सातवें मन्वंतर में गतिमान 28 वें कलियुग में मंत्रों के केंद्र में शक्ति पूर्ववत है मगर उनके निधिपति ब्राह्मण शक्तिविहीन हो गए हैं,इसलिए उनके द्वारा बार-बार उच्चारित किए जाने वाले वेद मंत्रों का पाठ करने पर भी मंत्र पूर्ण रूपेण जागृत नहीं हो रहे हैं।

भ्रम में न पड़ें : “जो हो रहा है सब ठीक हो रहा है” यह दुर्बुद्धि की उपज होती है अथवा यदि विषय को समझा न गया हो तो। ऐसा निष्कर्ष है ही नहीं, निष्कर्ष यह है कि संकट उत्पन्न न हो इसलिये जिसका जिस विधि से उपनयन हो रहा है, व्रात्यता भंग मानने के लिये युगधर्म से बाध्य हैं, किन्तु सुधार कैसे होगा इसका विचार करना ही होगा। जो व्रात्य हो चुका है उसके लिये निवारण का प्रयास करना होगा एवं अगली पीढ़ी पुनः न फंसे इसके लिये जनजागरण करना होगा अर्थात न केवल ब्राह्मण स्वयं के बच्चे का ससमय उपनयन करें अपितु यजमान को भी दोष से अवगत करें और यथाकाल उपनयन के लिये प्रेरित करें।

मनमुखी उत्तर का दुष्परिणाम
मनमुखी उत्तर का दुष्परिणाम

मनमुखी उत्तर का दुष्परिणाम

सामान्यतः एक प्रतिष्ठित पंडित/कर्मकांडी प्रश्न का उत्तर तत्काल देना प्रतिष्ठा का विषय मान लेते हैं और इससे समस्या यह होती है कि जिसका उत्तर अज्ञात भी हो उसका भी कुछ न कुछ उत्तर दे ही देते हैं भले ही वह शास्त्रोचित हो अथवा शास्त्रविरुद्ध। किन्तु इसका दुष्परिणाम भयंकर होता है और परम्परापोषक होने की घोषणा भी खंडित होती है, ब्रह्मघात तो प्रामाणिक तथ्य है ही। एक उत्कृष्ट उदाहरण से समझना उत्तम होगा :

भात के भोज में सब कुछ अब हलवाई बनाने लगा है और मैंने अपने जीवन में ही इस परिवर्तन को क्रमिक रूप होते देखा है और यह उसी मनमुखी उत्तर देने का दुष्परिणाम है। इससे ब्राह्मणत्व का क्षरण हो रहा है जो अकाट्य है।

  • सर्वप्रथम सब्जी के विषय में प्रश्न उठाया गया, सब्जी तो पूरी के भोज में भी हलवाई बनाता ही है, और कुछ न बनाये स्पर्श न करे तो सब्जी बनाने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये। अदूरदर्शियों ने मनमुखी उत्तर दे दिया हां हलवाई सब्जी, पापड़ आदि बनाये तो कोई हानि नहीं।
  • पुनः एक दशक में ही इसी प्रकार दाल का प्रश्न आया (भात) छोड़कर और हलवाई के कमीशनखोरों ने इसको भी उचित सिद्ध कर दिया कि दोष तो केवल भात में ही है।
    पुनः अगले दशक में भात के लिये भी कमीशनखोरों ने प्रश्न उठाया, अब विचार करने वाले के पास विकल्प ही नहीं रहा कि वो कैसे अस्वीकार करें। जब सब-कुछ हलवाई बना ही रहा है, बारात में पुलाव भी प्रचलित हो ही गया तो अब नहीं कैसे कह सकते सो भात भी हलवाई ही बनाने लगा।
  • नौटंकी यह देखिये कि यजमान के यहां पायस में अभी भी वितंडा करते हैं।

इसी प्रकार कर्मकांड में अदूरदर्शियों ने ऐसे-ऐसे मनमुखी निर्णय दिए कि पूर्णतः छिन्न-भिन्न हो गया :

  • नवग्रह समिधा क्रय करें या न करें तो हां कर दिया और नवग्रह समिधा के नाम पर कुछ भी हवन में दाल रहे हैं।
  • चन्दन में केवल रोली ही देंगे, घिसना तो भूल ही गये।
  • यह जानते हुये कि बाजार में जो सप्तमृत्तिका, सर्वौषधि, पंचरत्न प्राप्त हो रहा है वह अपद्रव्य है किन्तु कलश स्थापन में प्रयोग कर रहे हैं।
  • थर्मोकॉल पहले था नहीं, होता तो लिखते न; ऐसा कहकर अपना भ्रष्टबुद्धि धरल्ले से थर्मोकॉल के प्लेट में भोग भी लगाते हैं और सब तो चर्चा ही क्या करें ?
  • गंगाजल भी सोपानद् लाया जाय तो अशुद्ध हो जाता है किन्तु लाते हैं और उसी का प्रयोग करते हैं।
  • पैंट पहने वर से ही विवाह में होम कराने लगे।
  • दूध-दही-घृत में डेयरी वाला प्रयोग करने लगे।
  • पूजा-अनुष्ठान में धूप तो विलुप्त हो गया अगरबत्ती ही जलाने लगे।
  • अभिषेक के समय रुद्री भले २५ मिनट में ऐसे पढ़ लें कि कुछ भी स्पष्ट न हो किन्तु भजन १०-२० गाने लगे, किस पद्धति में है पता नहीं।
  • प्रधान पूजन भले ही १० – १२ मिनट में कर लें किन्तु गणेशाम्बिका पूजन में आधा घंटा लगाने लगे।
  • हवन में कोई भी विधान भले ही न करें, भले ही तिल-जौ-चावल में कीड़े-पत्थर भी रहें किन्तु अन्यान्य नाना द्रव्य मिलाने लगे।
  • भले ही प्रायश्चित्तविषयक रत्तीभर भी ज्ञान न हो किन्तु, गोनिष्क्रय (स्वार्थ) जहां-तहां कराने लगे।
  • इत्र के नाम पर थूका-मूता जो है वही चढाने लगे। (अधिकांशतः इत्र में जिसका प्रयोग किया जाता है वो है रजनीगंधा – अजीज़ा)

इस प्रकार से कर्मकांड में मनमुखी बोलने से ढेरों विकृतियां भर गई हैं और मतिभ्रष्टता का स्तर यह है कि जो बोले उसी को उल्टा पाठ पढ़ाया जाता है, गलत सिद्ध किया जाता है क्योंकि अधिकांशतः तो मतिभ्रष्ट ही हो रहे हैं।

निष्कर्ष

इस गहन शास्त्रीय विमर्श का मूल निष्कर्ष यह है कि कर्मकाण्ड और सामाजिक सदाचार के क्षेत्र में “जो हो रहा है, सब ठीक हो रहा है” का वक्तव्य देना कोई सन्तोष का विषय नहीं, अपितु यह बौद्धिक जड़ता, अज्ञान और अपनी शास्त्रीय अक्षमता को छुपाने की एक गम्भीर आत्म-वंचना है। जब एक सुविज्ञ ब्राह्मण अनुचित, अशास्त्रीय और आसुरी प्रवृत्तियों (जैसे हलवाई द्वारा निर्मित भात-भोज, अशुद्ध पूजन सामग्री, निषिद्ध काल में हवन आदि) को ‘सब ठीक है’ कहकर मौन स्वीकृति देता है, तो वह उस अनुचित कृत्य के भयंकर पाप का साक्षात् भागी बनता है।

वर्तमान कलियुग में व्याप्त व्रात्य दोष (समय पर उपनयन न होना) और अनाश्रमी जीवनशैली मानव सभ्यता के लिए आसन्न संकट का मुख्य कारण है। मिथिला के मनीषियों ने ‘नीर-क्षीर-विवेक’ के आधार पर उपनयन विधान में ‘भिखनि’ (अयाचित व्रत), सशिखा केशवपन और प्रत्याम्नाय (गोदान) जैसी रक्षात्मक कड़ियाँ जोड़कर युगधर्म के अनुसार व्रात्यता भङ्ग होने का जो सुगम मार्ग प्रशस्त किया था, उसे समझे बिना वर्तमान के ‘दुकानदार पुरोहित’ जनसामान्य को केवल भ्रमित कर रहे हैं। अतः अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए ‘मनमुखी उत्तर’ देने का पाखण्ड त्यागकर, शास्त्र सम्मत शुद्ध विधि की पुनर्स्थापना करना ही द्विज का परम कर्त्तव्य है।

FAQ

प्रश्न १: धार्मिक और कर्मकाण्ड के विषयों में “सब ठीक है” कहना क्यों एक भयंकर पाप माना गया है?

उत्तर: क्योंकि यह वक्तव्य सत्य के अन्वेषण को अवरुद्ध कर देता है। जब कोई पुरोहित अशास्त्रीय, विधि-हीन या विकृत कर्म को ‘सब ठीक है’ कह देता है, तो वह उस गलत कार्य को मान्यता प्रदान कर देता है, जिससे वह अनुचित कार्य के संपूर्ण दोष और पाप का भागी बन जाता है।

प्रश्न २: क्या व्रात्यता भङ्ग होने के बाद भी किसी अतिरिक्त शुद्धि की आवश्यकता होती है?

उत्तर: नहीं। यदि युगानुकूल परिष्कृत विधि और प्रत्याम्नाय (गोदान/गोमूल्य) के साथ उपनयन संस्कार संपन्न हो गया है, तो यह स्वीकारना बाध्यकारी है कि उस बालक की व्रात्यता समूल भङ्ग हो गई है और वह वेदमार्ग के लिए पूर्णतः अर्ह (योग्य) है।

प्रश्न ३: “को बड़ छोट कहत अपराधु”—इस संदर्भ में मनमुखी विचारों का क्या खंडन है?

उत्तर: शास्त्रों के नियमों को ताक पर रखकर अपनी मर्जी से किसी ऋषि या पद्धति को बड़ा या छोटा कहना अपराध है। यदि शास्त्र में किसी कर्म के दो भिन्न पक्ष (देशाचार भेद) उपलब्ध हैं, तो दोनों ही अपने-अपने स्थान पर पूर्णतः सत्य और ‘सब ठीक है’ की श्रेणी में आते हैं।

प्रश्न ४: कलयुग में ‘सुविधा’ और ‘सुख’ के मध्य क्या विरोधाभास उत्पन्न हो गया है?

उत्तर: आधुनिक युग में मनुष्यों ने सुख के स्थान पर ‘सुविधा’ (मशीनों और संसाधनों) को जीवन का केंद्र बना दिया है। परिणामस्वरूप, जितनी अधिक शारीरिक सुविधाएं बढ़ रही हैं, चित्त की शांति और वास्तविक सुख उतना ही दुर्लभ होता जा रहा है।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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