अस्थिसंचय : अशौच में वेदमंत्र का प्रयोग कैसे ?

अस्थिसंचय : अशौच में वेदमंत्र का प्रयोग कैसे ? अस्थिसंचय : अशौच में वेदमंत्र का प्रयोग कैसे ?

अन्त्य कर्म के विषय में एक विद्वान ब्राह्मण जो कि मेरे बेगूसराय के ही हैं “पंडित श्रीकृष्णमोहन झा (महारथपुर)” जी से एक गंभीर प्रश्न प्राप्त हुआ कि “अस्थिसंचय तो अशौचमध्य में ही होता है तो उक्त स्थिति में वेदमन्त्र प्रयोग की सिद्धि कैसे होती है?” अर्थात यदि अशौच में वेदमंत्र प्रयोग निषिद्ध है तो अस्थिसंचय में कैसे प्रयुक्त होता है। वास्तव में यह प्रश्न गंभीर था और इसके अन्वेषण में मुझे लगभग ३ माह लगे। यहां इसी गंभीर प्रश्न के शास्त्रीय आधार से सिद्धि की गयी है जो कि बहुत ही महत्वपूर्ण है।

अस्थिसंचय : अशौच में वेदमंत्र का प्रयोग कैसे ?

प्रश्न स्पष्ट है और यह भी स्पष्ट है कि हम शंका नहीं कर रहे हैं अथवा खंडन करने का कोई विचार ही नहीं रखते कि ऐसा नहीं हो सकता अपितु सिद्धि का प्रयास करने जा रहे हैं अर्थात यहां यह सिद्ध किया जायेगा कि किस विधान से अशौच होते हुये भी अस्थिसंचय में वेदमंत्र प्रयुक्त होता है। आगे बढ़ने से पूर्व हमें अशौच में निषिद्ध क्या-क्या होता है यह समझ लेना आवश्यक है :

दानं प्रतिग्रहो होमः स्वाध्यायः पितृकर्म्म च । प्रेतपिण्डक्रियावर्ज्जमाशौचे विनिवर्त्तते ॥
शंख स्मृति/१५/२४

दानं प्रतिग्रहो होमः स्वाध्यायश्च निवर्त्तते । दशाहात्तु परं शौचं विप्रोऽर्हति च धर्मवित् ॥
दक्षस्मृति/६/१३

आशीर्वादं देवपूजां प्रत्युत्थानाभिवन्दनम्। पर्यङ्केशयनं स्पर्शं न कुर्यान्मृतसूतके ॥
संध्यां दानं जपं होमं स्वाध्यायं पितृतर्पणं। ब्रह्म भोज्यं व्रतं नैव कर्तव्यं मृतसूतके ॥
नित्यं नैमित्तिकं काम्यं सूतके यः समाचरेत् । तस्य पूर्वकृतं नित्यादिकं कर्म विनश्यति॥

गरुडपुराण/१३/२० – २२ (षोडषाध्यायी)

यहां निषेध में स्वाध्याय (वेदाध्ययन) का स्पष्ट निषेध है किन्तु क्रिया परक मन्त्रप्रयोग का निषेध नहीं है। इसको समझ लेना आवश्यक है क्योंकि निषेध तो अनध्याय में भी है किन्तु वहां मंत्रप्रयोग तो निषिद्ध नहीं हो सकता। आगे प्रेतक्रिया (दशगात्रादि में भी) अमंत्रक सिद्ध होता है, दशगात्रादि क्रिया का आरम्भ ही कुशासन से होता है। इसके (प्रेतकृत्य) अतिरिक्त अन्य सभी कर्मों यहां तक कि व्रत का भी निषेध प्राप्त होता है और मंत्रप्रयोग संबंधी निषेध भी उक्त प्रेतकृत्यों के लिये ही मान्य है उससे इतर नहीं।

अस्थिसंचय : अशौच में वेदमंत्र का प्रयोग कैसे ?

क्योंकि उससे भिन्न कर्म का निषेध है, कर्म का निषेध होने से भी मन्त्रप्रयोग के अवसर का ही खंडन हो जाता है, तथापि मन्त्रप्रयोग निषिद्ध नहीं हो रहा। वास्तव में यहां क्रिया की वर्जना कही गयी है – “प्रेतपिण्डक्रियावर्ज्जमाशौचे” और उसमें प्रेतपिंडक्रिया को निषेध से बाहर रखा गया है। इसमें एक अन्य तथ्य यह भी है कि प्रेतपिण्ड से तात्पर्य सभी प्रेतक्रिया है न कि प्रेतपिंड मात्र अर्थात जितनी भी प्रेतक्रिया वर्णित है वो सभी। प्रेतक्रिया से भिन्न अन्यान्य सभी क्रिया निषिद्ध है। विमर्श का विषय अस्थिसंचय है तो अब अस्थिसंचय विषयक कुछ प्रमाणों का अवलोकन करते हैं :

अस्थिसंचय विषयक कुछ प्रमाण

सर्वेषामेव वर्णानान्त्रिभागात्स्पर्शनम्भवेत् । त्रिचतुःपञ्चदशभिः स्पृश्यवर्णाः क्रमेण तु ॥
चतुर्थे पञ्चमे चैव सप्तमे नवमे तथा । अस्थिसञ्चयनं कार्यं वर्णानामनुपूर्वशः ॥

अग्निपुराण/१५८/१७ – १८

प्रथमेऽह्नि द्वितीये वा तृतीये वा चतुर्थके । अस्थिसंचयनं कार्यं बन्धुभिर्हितबुद्धिभिः ॥
चतुर्थे पञ्चमे चैव सत्पमे नवमे तथा । अस्थिसंचयनं प्रोक्तं वर्णानामनुपूर्वशः ॥

नारदपुराण/पूर्वार्ध/१४/८४ – ८५ , लघुयमस्मृति/८७ – ८८

प्रथमेऽह्नि तृतीये वा सप्तमे नवमे तथा । अस्थिसंचयनं कार्यं दिने तद्गोत्रजैः सह ॥
गरुडपुराण/प्रेतकाण्डः (धर्मकाण्डः)/५/१५

अस्थिसंचय प्रयोग में अनेकानेक पक्ष हैं – प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम और नवम दिवस को अस्थिसंचयन कहा गया है। इसका सूक्ष्म अध्ययन करने से स्पष्ट हो जाता है कि प्रथम दिवस एकाह वा सद्यःशौच से सम्बंधित है, प्रथम-द्वितीय अथवा त्रिरात्राशौच के से सम्बंधित है। तृतीय-चतुर्थ दशरात्राशौच या ब्राह्मण के विषय में है, पंचम क्षत्रिय विषयक, सप्तम वैश्य के लिये और नवम शूद्र के लिये भी हो सकता है। इसके साथ ही विघ्न वा अन्यान्य कारणों से न हो सके तो अगले विकल्प को ग्रहण करे यह भी पक्ष है। दशरात्राशौच में चतुर्थ दिवस महत्वपूर्ण पक्ष है क्योंकि वहां तीन-दिन स्पर्शाशौच होता है।

चतुर्थे सञ्चयः कार्यः चतुर्थे वापि साग्निके । अस्थिसञ्चयनं कार्यं दद्यादापाञ्जलिं ततः ॥
गरुडपुराण/प्रेतकाण्डः (धर्मकाण्डः)/३४/१४

चतुर्थेऽहनि कर्तव्यमस्थिसञ्चयनं द्विजैः । अस्थिसञ्चयनादूर्द्ध्वं अङ्गशौचं विधीयते ॥
दक्षस्मृति/६/१६

स्नात्वा त्रिरात्रं कुर्वन्ति प्रेतायोदकतर्पणम्। श्मशानदेवतायागं चतुर्थे दिवसे ततः ॥
वाचस्पति उद्धृत (पितृभक्ति तरंगिणी)

यहां यह स्पष्ट है कि दशाहाशौच में चतुर्थ दिवस प्रधान पक्ष है, साग्निकों के लिये अन्यान्य पक्ष भी है जिसमें से चतुर्थ दिवस भी कहा गया है। साग्निकों के विषय में दाह से अशौच व्याप्ति तो है ही इसका एक अन्य भाव संचय से अशौचपरक भी है। साग्निकों के लिये अशौच विधान ही यहां खंडित भी होता है। एवं वेद-अग्नि दोनों से युक्त होने पर अन्यान्य अनेकानेक पक्ष हैं जिसका मैंने गंभीरता से अवलोकन भी नहीं किया है और पूरी संभावना है कि उनके विधान को स्पष्ट करने का प्रयास करें तो त्रुटियां ही त्रुटियां समाहित होगी। हमें निरग्निक विषयक तथ्य को समझना है।

आगे साग्निक हो अथवा निरग्निक दोनों के लिये चतुर्थ दिवस अस्थिसंचय का प्रधान पक्ष है यह पुनः स्पष्ट होता है। इसमें द्वितीय, तृतीय आदि का तात्पर्य जो परम्परा से प्राप्त हो उसका ग्रहण करे अथवा अशौचादि के अनुसार भी हो सकता है जहां परम्परा से विरोध न हो। इसके साथ ही विधि का भी वर्णन किया गया है :

चतुर्थे सञ्चयः कार्यः साग्निकैश्च निरग्निकैः। तृतीयेऽह्नि द्वितीये वा कर्त्तव्यश्चाविरोधतः ॥
गत्वा श्मशानभूमिं च स्नानं कृत्वा शुचिर्भवेत्। ऊर्णासूत्रं वेष्टयित्वा पवित्रीं परिधाय च ॥
दद्यात् श्मशानवासिभ्यस्ततो माषबलिं सुतः। यमाय त्वेतिमन्त्रेण तिस्रः कुर्यात्परिक्रमा ॥
ततो दुग्धेन चाभ्युक्ष्व चितस्थानं खगेश्वर। जलेन सेचयेत्पश्चादुद्धरेदस्थि वृन्दकं ॥
कृत्वा पलाशपत्रेषु क्षालयेद्दुग्धवारिभिः। संस्थाप्य मृण्मये पात्रे श्राद्धं कुर्याद्यथाविधि ॥

गरुडपुराण/११/६७ – ७१ (षोडषाध्यायी)

ध्यातव्य यह है कि उक्तविधान में कोई अन्य विकल्प अथवा साग्निक-निरग्निक भेद जैसा कुछ भी दृष्ट नहीं है। स्पष्ट रूप से “श्राद्धं कुर्याद्यथाविधि” कहा गया है और साग्निक-निरग्निक दोनों का प्रथम ही उल्लेख किया गया है। आगे अस्थिसंचय के सन्दर्भ में एक तथ्य और महत्वपूर्ण है वो यह कि दश दिन के भीतर ही निक्षेप भी हो जाये यदि किसी कारण से न कर सके तो संवत्सर मध्य में न करे। अर्थात मुख्यतः अशौच में भी कर्तव्य है।

अस्थिक्षेपो गयाश्राद्धं श्राद्धञ्चापरपक्षिकम् । अब्दमध्ये न कुर्वीत सपिण्डीकरणं विना ॥
गरुडपुराण/प्रेतकाण्डः (धर्मकाण्डः)/३४/११३

“कर्त्तव्यन्तु नवैः श्राद्धं देशकालाविरोधत” – पितृभक्ति तरंगिणी में वाचस्पति उद्धृत करते हैं।

यज्ञकाले विवाहे च दैवयोगे तथैव च । हूयमाने तथा चाग्नौ नाशौचं नैव सूतकम् ॥
स्वस्थकाले त्विदं सर्वमशौचं परिकीर्तितम् । आपद्गतस्य सर्वस्य सूतकेऽपि न सूतकम् ॥

दक्षस्मृति/६/१८ – १९

यहां पुनः एक तथ्य जान लेना आवश्यक है कि अनेकानेक परिस्थितियों में जिसको तीन प्रकार से समझा जा सकता है एक यह कि कुछ अपरिहार्य कार्य होते हैं एवं आरम्भ हो चुके हों उसमें अशौच की मान्यता नहीं होती, दूसरा यह कि आपातकाल में भी मान्यता नहीं होती किन्तु विचार विवेकपूर्ण होना चाहिये जिसका सामान्य सूत्र है कि विद्वान ब्राह्मण की आज्ञा से मान्य करे, तृतीय पक्ष यह है कि प्रेतक्रिया का अशौच में निषेध नहीं है। उक्त परिस्थियों में जो कर्तव्य हो वहां अशौच की मान्यता न होकर सद्यःशौच हो जाता है।

नवश्राद्धममन्त्रं तु पिण्डोदकविवर्जितं। – कण्व (स्मृतिमुक्ताफल श्राद्धकांड)

यदि अमन्त्रक प्रयोग है भी नवश्राद्ध के विषय में तो वहां पिण्डोदक का भी निषेध है।

अब तक जो महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट हुये वो बिन्दुवार इस प्रकार हैं :

  • अस्थिसंचय का मुख्य पक्ष दशरात्राशौच में है जिसमें चतुर्थ दिवस प्रधान है।
  • अशौच में प्रेतक्रिया के अतिरिक्त अन्य कर्मों का निषेध है जिसमें स्वाध्याय भी कहा गया है किन्तु इससे वेदमंत्र का निषेध सिद्ध नहीं होता।
  • अस्थिसंचय तो अशौच में ही कर्तव्य है केवल स्पर्शाशौच का त्याग करना आवश्यक होता है, विसर्जन का भी मुख्य पक्ष यही है। किसी कारण से न कर सकें तो वर्षमध्य में निषिद्ध है।
  • अस्थिसंचय के विषय में साग्निक और निरग्निक के भेद से विधान का भेद नहीं मिलता और अमन्त्रक करने का भी विधान नहीं है अर्थात मन्त्र का निषेध नहीं है, कदाचित हो तो मेरे लिये दृष्ट नहीं। मेरा दृष्ट जो है वो प्रेतक्रिया में निषेध का है, अस्थिसंचय को प्रेतक्रिया नहीं समझा जाय यह आवश्यक है, इसके लिये श्राद्ध की विधि कही गयी है।
  • अन्यान्य प्रकार से भी विशेष परिस्थितियों में अशौच की मान्यता नहीं होती।
  • उदाहरण जैसे उर्ध्वपुण्ड्र का निषेध नहीं है तो करेगा। प्रणव का निषेध नहीं है तो प्रणव उच्चारण भी करेगा। यदि प्रणव उच्चारण करेगा तो वेदमंत्र का भी प्रयोग निषेध न होने से वेदमंत्र का भी प्रयोग करेगा। प्रेत के दशगात्रादि में मंत्र का निषेध है किन्तु प्रणव प्रयोग होगा, अस्थिसंचय में मंत्रनिषेध नहीं अपितु प्रशस्त है अस्तु किया जायेगा।

अघमर्षणसूक्तं तु यावन्मज्जति तज्जपेत्। – ब्रह्मपुराण (स्मृतिमुक्ताफल श्राद्धकांड)

सूत्रोद्भव – तदपि ग्राह्यं और “त्यागेन लब्धं”

निर्गन्धमपि मन्दारपीतकोरण्डकादि यत्। प्रशस्तं तदपि ग्राह्यं गिरिकर्ण्यादिवर्जितम् ॥
विष्णुसंहिता/पटलः १५/१००

“तदपि ग्राह्यं” : धर्म में रूचि न हो तो भी ग्राह्य है, धर्म में हानि दिखे तो भी ग्राह्य है, धर्म में सर्वस्वनाश दिखे तब भी ग्राह्य है।

यहां मैं एक सूत्रोद्भव पूर्वक सूत्रपात करूँगा तदपि ग्राह्यं, यद्यपि न्याय में कोई न कोई ऐसा सूत्र अवश्य होगा जो यहां प्रयुक्त हो सकता है, किन्तु यह कर्मकांड के निमित्त स्थापित किया जा रहा है। यद्यपि इस सूत्र के अनेकानेक नाम आगे मत्यानुसार सोचे जा सकते हैं किन्तु यह इसी संज्ञा को धारण करेगा। तदपि ग्राह्यं का तात्पर्य उस कर्म से है जो शास्त्र से एक पक्ष द्वारा निषिद्ध हो, तदपि द्वितीय पक्ष से अपरिहार्य हो अर्थात त्याग नहीं किया जा सके; ग्रहण ही करना पड़े अथवा किसी अन्य कारण से शास्त्र द्वारा ही ग्राह्यता अनिवार्य सिद्ध हो।

तदपि ग्राह्यं
तदपि ग्राह्यं

एक बात और कि यह सूत्र भले ही मैं स्थापित कर रहा हूँ किन्तु प्रश्नकर्त्ता के प्रश्न इतने उच्च कोटी का था जिसमें एक सूत्र प्रकट हुआ, अस्तु यह सूत्र तदपि ग्राह्यं प्रश्नकर्त्ता “पण्डित श्रीकृष्णमोहन झा (महारथपुर)” जी को ही समर्पित किया जाता है और उन्हीं के नाम से जाना जाय। मैं इनका पूर्व से ही ऋणी हूँ और पूर्व प्रकाशित पुस्तक “सुगम श्राद्ध विधि” के संपादन में इन्हीं का मुख्य सहयोग प्राप्त हुआ था, यह मेरा ही दुर्भाग्य है कि “सिद्धं सुसिद्धं श्राद्धं” में इनका कोई सहयोग-समर्थन प्राप्त न कर पाया।

चुटकी : हम दोनों पर परस्पर भी तदपि ग्राह्यं सूत्र प्राकारान्तर से घटित होता है।

“त्यागेन लब्धं” : जो त्याग से प्राप्त होता है अर्थात् वैराग्य, आत्मकल्याण, धर्म । त्यागेन लब्धं सूत्र का तात्पर्य है जब ग्राह्य अज्ञात हो किन्तु अग्राह्य ज्ञात हो तो अग्राह्य का त्याग करके जो शेष रहे वह लब्ध होगा, वही ग्राह्य होगा। इसे दूसरे प्रकार से समझें तो वैकल्पिक प्रश्न को हल करने के एक तरीके से समझ सकते हैं। जब सही विकल्प ज्ञात न हो तब गलत विकल्पों को देखना पड़ता है और जो-जो विकल्प गलत हो उसका त्याग करने पर जो अंतिम बचता है वह लब्ध होता है और वही सही विकल्प होता है।

इस प्रकार यहां यह स्पष्ट हो रहा है कि जब दो या अधिक पक्ष हो जिसमें से एक सही हो किन्तु ज्ञात न हो, वहीं अन्य जो स्पष्ट रूप से गलत ज्ञात हो उन सबका त्याग करने पर अंतिम पक्ष जो शेष रहे वह लब्ध होगा अर्थात् सही होगा। हो सकता है कि आपने भी इस प्रकार से वैकल्पिक प्रश्नों को हल किया होगा। उदाहरण के लिये एक प्रश्न को समझते हैं : राम का उपनयन कितने वर्ष में हुआ था :

विकल्प :२३२४२५

अब यहां मान लीजिए सही उत्तर ज्ञात नहीं है तो अनुमान पूर्वक सभी गलत विकल्पों का त्याग करेंगे और जो अंतिम विकल्प होगा वही लब्ध होगा अर्थात् सही उत्तर होगा । राम व्रात्य दोष से युक्त नहीं हुये थे अस्तु २३, २४, २५ वर्षों में नहीं हुआ होगा क्योंकि यदि २२ वर्ष में न होता तो व्रात्य हो जाते अस्तु २३, २४, २५ तीन विकल्पों का त्याग करने पर अंतिम विकल्प जो ५ वर्ष जो लब्ध होता है वहीं सही उत्तर होगा।

“तदपि ग्राह्यं” सूत्र प्रयोग

“तदपि ग्राह्यं” सूत्र विशेष परिस्थिति से संबंधित है यह स्पष्ट है और इसे हम श्राद्ध प्रकरण में ही एक स्थिति विशेष के संदर्भ में समझेंगे। अशौच प्रकरण में एक अतीताशौच विचार भी आता है। अशौच के व्यतीत होने पर ज्ञात हो तो उस समय जो अशौच लगता है वह अतीताशौच नाम से जाना जाता है। इसमें सामान्य विधान दशाह के पश्चात वर्षपर्यंत श्रवण होने पर त्रिरात्राशौच का है तदुपरांत सद्यःशौच। इसमें अन्य पक्ष भी आते हैं जो ६ माह तक त्रिरात्राशौच, ९ माह तक पक्षिणी, संवत्सर तक १ दिन और तदुपरांत सद्यः। पुत्र हेतु सदैव पुत्तलदाह में भी त्रिरात्राशौच होता ही है अन्य विचार सपिण्डादि विषयक है।

“तदपि ग्राह्यं” सूत्र प्रयोग
“तदपि ग्राह्यं” सूत्र प्रयोग

अतिक्रान्ते दशाहे च त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् । संवत्सरे व्यतीते तु स्पृष्ट्वैवापो विशुध्यति ॥
निर्दशं ज्ञातिमरणं श्रुत्वा पुत्रस्य जन्म च । सवासा जलं आप्लुत्य शुद्धो भवति मानवः ॥

मनुस्मृति/५/७७ – ७८

देशान्तरगतः श्रुत्वा कुल्यानां मरणोद्भवौ । यच्छेषं दशरात्रस्य तावदेवाशुचिर्भवेत् ॥
अतीते दशरात्रे तु तावदेव शुचिर्भवेत् । तथा संवत्सरेऽतीते स्नात एव विशुध्यति ॥

शंख स्मृति १५/११ – १२

देशान्तरस्थः श्रुत्वा तु कुल्याणां मरणोद्भवौ। यच्छेषं दशरात्रस्य तावदेवशुचिर्भवेत् ॥
अतीते दशरात्रे तु त्रिरात्रमशुचिर्भवेत्। तथा संवत्सरेऽतीते स्नात एव विशुद्ध्यति ॥

अग्निपुराण/१५७/१३ – १४

अब यहां एक अन्य नियम भी उपस्थित होगा वो यह कि प्रथम अधिकारी के सक्षम होने पर उत्तर को अधिकार प्राप्त नहीं होता, प्रथम यदि असमर्थ हो तो ही उत्तर अधिकारी कर सकता है। यहां यदि ज्येष्ठ पुत्र विदेश में हो और सभी क्रियायें कनिष्ठ पुत्र द्वारा किया गया, यदि एकादशाह के दिन आद्यश्राद्ध आरम्भ होने से पूर्व ज्येष्ठ पुत्र उपस्थित हो जाये तो क्या-क्या शास्त्रीय विधान है :

  • प्रथम यह कि वह एकादशाह के दिन श्रवण करेगा और तदनंतर उसे त्रिरात्राशौच होगा।
  • द्वितीय उसके लिये दशगात्र पिण्डदान अनिवार्य है अतः ज्येष्ठपुत्र दशगात्र पिंडदान करेगा। कनिष्ठ पुत्रादि दाह निमित्त से दशगात्र करते हैं, ज्येष्ठ का दायित्व होता है क्योंकि प्रेतगात्र का निर्माण ज्येष्ठ पुत्र के पिंडों से ही होता है।
  • तदनंतर एकादशाह को आद्यश्राद्ध होना ही है, ज्येष्ठ पुत्र को ज्ञात होने से भले ही त्रिरात्राशौच होते हुये भी “तदपि ग्राह्यं” सूत्र घटित होगा और सद्यःशौच होगा।
  • सद्यःशौच होने के कारण ज्येष्ठपुत्र ही क्षौरादि करके आद्य श्राद्ध करेगा।
  • यहां आद्यश्राद्ध में ज्येष्ठपुत्र मंत्रप्रयोग भी करेगा, उनके लिये अन्य बात है जो प्रेतश्राद्ध में मन्त्र को ग्रहण ही नहीं करते।

अन्येन यस्य संस्कारः कृतस्तस्यात्मजः पुनः । कुर्यादेव यथाशास्त्रमन्यथा किल्विषी भवेत् ॥
पुत्रस्यासंनिधाने यः पिंडदाने प्रवर्तते । तत्संनिधौ प्रवृत्तोऽपि संत्याज्यः पिंडदस्ततेंः ॥
मुख्यकर्त्रागमेऽन्यस्तु प्रवृत्तोऽपि क्रियां त्यजेत् । ततस्तु कर्म कुर्वीत संस्कर्ता विसृजेत्ततः ॥

स्मृतिरत्न, स्मृति मुक्ताफल (श्राद्ध काण्ड)

ज्येष्ठोऽथ वांतरा गच्छेत् सोऽस्य शेषं समापयेत् ॥ – पारस्कर
आद्यश्राद्धमशुद्धोऽपि कुर्यादेकादशेऽहनि । कर्तुस्तात्कालिकी शुद्धिरशुद्धः पुनरेव सः॥ – शंख
(स्मृति मुक्ताफल – श्राद्ध काण्ड)

सद्यःशौचेऽपि दातव्यं प्रेतस्यैकादशेऽहनि । स एव दिवसस्तस्य श्राद्ध शय्यासनादिषु ॥ – शंख
त्र्यहाशौचेऽपि कर्तव्यमाद्यमेकादशेऽहनि । अतीतविषये सद्यस्त्र्यहादूर्ध्वं तदिष्यते ॥ – उशना
(श्राद्ध कल्पलता)

“आद्यश्राद्धमशुद्धोऽपि कुर्यादेकादशेऽहनि”, “त्र्यहाशौचेऽपि कर्तव्यमाद्यमेकादशेऽहनि” आदि वचन जहां कहीं भी हैं वह उक्त परिस्थिति विशेष को ही व्यक्त करते हैं एवं “तदपि ग्राह्यं” सूत्र की पुष्टि करते हैं। यद्यपि यहां उक्त विषय में अनेकानेक परिस्थितियां हैं और तदनुसार निर्णय भी होंगे किन्तु विषय से संबंधित पक्ष यही था। जिस प्रकार परिस्थिति विशेष होने से “तदपि ग्राह्यं” सूत्र स्थापित होता है और आद्य श्राद्ध अशौच होने पर भी ज्येष्ठ पुत्र द्वारा किया जायेगा उसी प्रकार अस्थिसंचय में भी “तदपि ग्राह्यं” सूत्र घटित होगा और मंत्रप्रयोग होगा।

यद्यपि एक मत से “आद्यश्राद्धमशुद्धोऽपि कुर्यादेकादशेऽहनि” – इस वचन को क्षत्रियादि के निमित्त भी स्वीकार किया गया है। किन्तु इसका मूल तात्पर्य ब्राह्मण हेतु उक्त परिस्थिति में ही है। इसको अन्य प्रकार से भी विचारा जा सकता है वो यह की यदि एक ही पुत्र हो जो अनुपस्थित हो सूचित भी न हो सका हो तो दाहादिकर्त्ता सपिण्ड-सोदकादि सारी क्रिया करेगा किन्तु पुत्र यदि उपास्थित हो जाये तो वहां पुत्र पुनः अधिकार प्राप्त कर लेगा। इसमें अनेक प्रकार की स्थितियां होती है दाह से अस्थिसंचय के मध्य, अस्थिसंचय से क्षौर के मध्य, क्षौर के उपरांत आद्य श्राद्धारम्भ से पूर्व, द्वादशाह के दिन, श्राद्ध के उपरांत।

वर्त्तमान में द्वादशाह के दिन मासिक और सपिंडीकरण ध्रुव हो गया है अस्तु आगे का श्राद्ध भी करेगा अर्थात द्वादशाह का भी श्राद्ध करेगा। किन्तु पूर्वकाल में जब ध्रुव नहीं था तो केवल आद्यश्राद्ध के लिये ही कहा गया था शेष यथाकाल में।

“त्यागेन लब्धं” सूत्र

इसी प्रकार “त्यागेन लब्धं” सूत्र को भी स्पष्ट किया जायेगा। इसको समझने के लिये प्रथम कुछ बिंदुओं को संक्षेप में समझना आवश्यक है :

  • षोडश श्राद्ध में ज्येष्ठ पुत्र को ही प्रथम अधिकार होता है।
  • ये एक पुत्र हो तो उसे ही सम्पूर्ण अधिकार होता है अर्थात पुत्रवानों का श्राद्ध अन्य व्यक्ति न करे, इसका स्पष्ट निषेध है। जैसे दशरथ जी के लिये भरत की प्रतीक्षा की गयी किन्तु किसी अन्य ने नहीं किया।
  • ज्येष्ठ पुत्र की अनुपस्थिति होने पर यदि कनिष्ठ को श्राद्ध करना ही पड़े तो भी सपिंडीकरण न करे। ६ माह तक ज्येष्ठ के आने की प्रतीक्षा करे और न आने पर करे। अर्थात सपिण्डीकरण ज्येष्ठ ही करेगा यदि ६ माह के भीतर उपस्थित हो जाये तो।
  • उपस्थित होते हुये भी यदि ज्येष्ठ पुत्र असमर्थ हो तो उसकी अनुमति से ही कनिष्ठ सम्पूर्ण क्रिया करे।
  • इस प्रकार यदि कनिष्ठ पुत्र ने सम्पूर्ण श्राद्ध कर भी लिया हो तो भी ज्येष्ठ पुत्र के लिये दशगात्र पिण्डदान और सपिंडीकरण आवश्यक होता है। यद्यपि कुछ निषेधात्मक वचन भी होते हैं और उसमें प्रायश्चित्त का विकल्प कहा गया है। प्रायश्चित्त कथन से यह सिद्ध होता है कि अनिवार्य है न करने से प्रत्यवाय होता है।

भरत ने पिता का श्राद्धकर्म किया
ततः दशाऽहेऽतिगते कृतशौचो नृपात्मजः । द्वादशेऽहनि सम्प्राप्ते श्राद्धकर्माण्यकारयत् ॥
रामायण/अयोध्याकाण्ड/७७

राम ने भी इङ्गुदी (बदरी मिश्रित) का पिण्डदान किया
ऐङ्गुदं बदरीमिश्रं पिण्याकं दर्भसंस्तरे । न्यस्य राम: सुदु:खार्त्तो रुदन्वचनमब्रवीत् ॥
इदं भुङ्क्ष्व महाराज प्रीतो यदशना वयम् । यदन्न: पुरुषो भवति तदन्नास्तस्य देवता: ॥

रामायण/अयोध्याकाण्ड/१०२

रामकृत पिण्डदान की पुनर्पुष्टि
अद्यायमपि ते पुत्र: क्लेशानामतथोचित: । नीचानर्थसमाचारं सज्जं कर्म प्रमुञ्चतु ॥
दक्षिणाग्रेषु दर्भेषु सा ददर्श महीतले । पितुरिङ्गुदिपिण्याकं न्यस्तमायतलोचना ॥
तं भूमौ पितुरार्तेन न्यस्तं रामेण वीक्ष्य सा । उवाच देवी कौसल्या सर्वा दशरथस्त्रिय: ॥
इदमिक्ष्वाकुनाथस्य राघवस्य महात्मन: । राघवेण पितुर्दत्तं पश्यतैतद्यथाविधि ॥
तस्य देवसमानस्य पार्थिवस्य महात्मन: । नैतदौपयिकं मन्ये भुक्तभोगस्य भोजनम् ॥

चतुरन्तां महीं भुक्त्वा महेन्द्रसदृशो विभु: । कथमिङ्गुदिपिण्याकं स भुङ्क्ते वसुधाधिप: ॥
अतो दु:खतरं लोके न किञ्चित् प्रतिभाति मा । यत्र राम: पितुर्दद्यादिङ्गुदीक्षोदमृद्धिमान् ॥
रामेणेङ्गुदिपिण्याकं पितुर्दत्तं समीक्ष्य मे । कथं दु:खेन हृदयं न स्फोटति सहस्रधा ॥
श्रुतिस्तु खल्वियं सत्या लौकिकी प्रतिभाति मा । यदन्न: पुरुषो भवति तदन्नास्तस्य देवता: ॥

रामायण/अयोध्याकाण्ड/१०३

प्रश्न : जब भरत ने श्राद्ध कर ही लिया तो राम ने कौन सा श्राद्ध किया था ?

यहां भगवान राम ने मन्दाकिनी तट पर जब भरत से मिले थे और पिता के मृत्यु की सूचना मिली तो रोदनादि किया, आगे पिण्डदान भी किया। यहां प्रश्न यही है कि कौन सा पिंडदान किये ? कौन सा श्राद्ध किये ? क्योंकि ये स्पष्ट नहीं है। यहां “त्यागेन लब्धं” सूत्र से ही ज्ञात किया जायेगा कि भगवान श्रीराम ने वहां कौन सा श्राद्ध किया था, यह ध्यान रखें कि उसके उपरांत गया आदि में जिस तीर्थश्राद्ध की चर्चा है वो भिन्न है। यहां केवल उस काल में किये गए श्राद्ध का प्रश्न है जब भरत से पितृमरण की सूचना प्राप्त हुई और उन्होंने इंगुदी फल का पिंडदान किया।

संदर्भ : भरत ने पिता की सपूर्ण प्रेतकर्म (श्राद्ध -दानादि) संपन्न किया। इसके पश्चात् वो राम को बुलाने के लिये प्रस्थान करते हैं। इसमें दिन भी प्रश्न नहीं है कि २०वें दिन मिले अथवा ३०वें दिन मिले। इतना स्पष्ट है कि पिता कि मृत्यु से महीने भर के भीतर ही मिले। जब राम-भरत मिलते हैं तो संवाद होता है और संवाद में भरत के द्वारा राम को पिता के मृत्यु की सूचना प्राप्त होती है। इसके पश्चात् रोदन क्रिया और तदनन्तर तिलांजलि, पिंडदान किया जाता है।

इस प्रसंग से आगे अन्यान्य श्राद्ध (जैसे गया में किया गया श्राद्ध आदि) से सम्बंधित ही नहीं है केवल उतना ही है जहां राम को पिता के मृत्यु की सूचना मिलती है और वहां जो क्रिया की गई। मुख्य विषय यह है कि इस प्रश्न में अनेकानेक प्रश्न समाहित हैं और इसका उत्तर मिलने पर वर्त्तमान में भी अनेकानेक प्रश्नों का उत्तर प्राप्त होगा। मूल प्रश्न :

  1. राम जब पिता के मृत्यु की सूचना प्राप्त करते हैं तो उनको कितना अशौच होगा ?
  2. यदि राम ने किया अर्थात करना ही था तो अशौच में ही क्यों किया अथवा अशौच हुआ ही नहीं?
  3. जब भरत ने श्राद्धकर्म कर दिया तो राम ने कौन सा श्राद्ध किया ?

चूंकि इस प्रश्न का उत्तर ढूंढने वाले को अनेकानेक प्रश्नों का उत्तर ज्ञात होगा; इसलिये इस प्रश्न को अधिकांश विद्वानों तक उपरोक्त प्रमाण के साथ प्रेषित किया जाना चाहिये और मूल प्रश्न का उत्तर प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिये।

  • प्रथम प्रश्न का उत्तर है त्रिरात्राशौच (वर्णानुसार विचार भी आवश्यक)
  • द्वितीय प्रश्न का उत्तर है कि वहां राम के लिये दशगात्र प्रथम करणीय था उसमें अशौच का विचार ही नहीं होगा।

तृतीय प्रश्न के लिये श्राद्ध क्या हो सकता है इसके लिये अब “त्यागेन लब्धं” से विचार किया जायेगा।

  • क्या तीर्थश्राद्ध किये होंगे – नहीं यह तो वर्ष मध्य में निषिद्ध है।
  • क्या (सांवत्सरिक) पार्वण श्राद्ध किये होंगे – नहीं, क्षयाह (सांवत्सरिक से संभव)
  • क्या वृद्धिश्राद्ध किये होंगे – नहीं।
  • क्या आद्य श्राद्ध (एकादशाह) किये होंगे – नहीं, भरत ने किया था।
  • क्या मासिक श्राद्ध किये होंगे – नहीं भरत ने किया (ज्येष्ठ की अनुपस्थिति में अधिकार से)
  • क्या सपिण्डीकरण श्राद्ध किये होंगे – हां, क्योंकि भरत को अधिकार नहीं था अथवा न्यूनतम ६ माह प्रतीक्षा करके कर सकते थे।
“त्यागेन लब्धं” सूत्र
“त्यागेन लब्धं” सूत्र

यहां प्रथम पक्ष तो दशगात्र पिण्डदान का ही है और राम द्वारा भी किया गया यह सिद्ध होता है। द्वितीय “त्यागेन लब्धं” से अन्यान्य श्राद्ध का त्याग करने पर (क्योंकि सिद्धि नहीं हो सकती) सपिण्डीकरण शेष बचता है और भरत का अधिकार भी नहीं था सो भरत ने नहीं किया होगा एवं राम का ही अधिकार था तो राम ने किया। विद्वानों (शास्त्रवेत्ताओं) द्वारा भी यही पक्ष स्वीकार किया गया है।

ये कथावाचकों (वर्त्तमान) का विषय नहीं है कथा कहना और कर्मकांड के विषयों का निर्धारण करना, धर्म का निर्धारण करना, कर्तव्य को सुनिश्चित करना शास्त्रवेत्ताओं के अधिकारक्षेत्र में होता है। ऐसा इसलिये कहा जा रहा है कि वर्त्तमान में कथा कहना (प्रशिक्षण लेकर) आरम्भ नहीं किया कि धर्मगुरु बन जाते हैं, धर्म का निर्धारण करने लगते हैं, कर्तव्याकर्तव्य का निर्धारण करने लगते हैं जो उसके अधिकारक्षेत्र में होता ही नहीं है। अरे इस विषय को समझने में वर्षों लगेंगे।

राम क्या कर सकते थे यह स्पष्ट है तथापि वर्त्तमान में इसको समझना कठिन हो गया है अस्तु द्वितीय प्रकार से ढेरों विकल्पों में से त्याग करके जो शेष बचा वही “त्यागेन लब्धं” से सिद्ध होता है। कारण कि राम ने किया था तो क्या किया यह किसी न किसी विधान से ही ज्ञात हो सकता है।

सामान्यतः लोग इस प्रश्न का उत्तर तीर्थश्राद्ध वा पार्वण देते हैं जबकि संवत्सर मध्य में निषेध है, दशगात्र का तो विचार ही नहीं करते जबकि प्रथम सिद्धि दशगात्र की ही होती है। एवं सद्यःशौच होकर शेष जो कर्तव्य सिद्ध होता है वह। त्रिरात्राशौच के पश्चात् तब सम्पूर्ण श्राद्ध होगा जब किसी अन्य ने न किया हो, वहां पुत्तल दाह विधान भी होगा, किन्तु राम को पुत्तल दाह करके सम्पूर्ण क्रिया करने की आवश्यकता नहीं थी। इस कारण सद्यःशौच हुआ और सपिंडीकरण किया गया।

निष्कर्ष

शास्त्रों का सूक्ष्म विन्यास प्रमाणित करता है कि अशौच के भीतर केवल ‘प्रेतक्रिया से भिन्न’ लौकिक या दैव कार्यों का बाध होता है। “प्रेतपिण्डक्रियावर्ज्जमाशौचे विनिवर्त्तते” के सिद्धान्त के अनुसार अस्थिसञ्चय को प्रेतक्रिया के आवरण से मुक्त रखकर ‘यथाविधि श्राद्ध’ की श्रेणी में रखा गया है। अपरिहार्य परिस्थितियों (जैसे ज्येष्ठ पुत्र का देशान्तर से विलम्ब से आगमन) में जब तात्कालिक शुद्धता अनिवार्य हो, तब “तदपि ग्राह्यं” सूत्र के अनुसार अशौच के मध्य भी सद्यःशौच होकर मन्त्रपूर्वक क्रिया सम्पन्न की जाती है।

इसी प्रकार वाल्मीकि रामायण के प्रसंग में, जब भरत द्वारा और्ध्वदेहिक क्रिया सम्पन्न होने के बाद भी मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम द्वारा मन्दाकिनी तट पर किए गए पिण्डदान का अन्वेषण किया जाता है, तब “त्यागेन लब्धं” सूत्र (असिद्ध विकल्पों के परित्याग) से यह सिद्ध होता है कि श्रीराम ने वहाँ दशगात्र पिण्डदान एवं प्रत्यवाय न हो इस हेतु ‘सपिण्डीकरण श्राद्ध’ ही सम्पन्न किया था।

निवेदन : प्रमादादि वश त्रुटि और विसंगति सदैव संभावित रहती है, यदि विद्वद्जनों को प्रतीत हो तो कृपया अवगत करें।

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

अस्वीकरण: इस आलेख में प्रस्तुत निष्कर्ष प्राचीन गृह्यसूत्रों, पुराणों और निर्णयसिंधु आदि प्रामाणिक ग्रंथों के सूक्ष्म अंतर्संबंधों के समन्वय पर आधारित हैं। पारंपरिक रूप से प्रचलित देश-भेद या कुलाचार जनित भ्रम की स्थिति में सुधी पाठक शास्त्रीय साक्ष्यों को ही सर्वोपरि मानें। उपरोक्त विश्लेषण समझने के लिये है किसी भी प्रकार का निर्णय स्वविवेक, शास्त्रमंथन और विद्वानों के निर्देशन में लें।

कर्मकांड विधि में शास्त्रोक्त प्रमाणों के साथ प्रामाणिक चर्चा की जाती है एवं कई महत्वपूर्ण विषयों की चर्चा पूर्व भी की जा चुकी है। तथापि सनातनद्रोही उचित तथ्य को जनसामान्य तक पहुंचने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। एक बड़ा वैश्विक समूह है जो सनातन विरोध की बातों को प्रचारित करता है। गूगल भी उसी समूह का सहयोग करते पाया जा रहा है अतः जनसामान्य तक उचित बातों को जनसामान्य ही पहुंचा सकता है इसके लिये आपको भी अधिकतम लोगों से साझा करने की आवश्यकता है।

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