यज्ञ-हवन व अनेक अवसरों पर आपको जब अग्नि स्तुति की आवश्यकता होती है तो सामान्य रूप से ढूंढने पर नहीं मिलती, किन्तु अनेकानेक ऐसे अवसर होते हैं जब यदि उपलब्ध होती तो अग्नि की स्तुति करते। अब आपके लिये अग्नि स्तुति उपलब्ध है और जब आवश्यकता हो कर सकते हैं। यहां सौरपुराणोक्त अग्नि स्तुति (agni stuti) संस्कृत में दिया गया है।
पढ़ें अग्नि स्तुति संस्कृत में – agni stuti
देवा ऊचुः
जलभीरो जलोत्पन्न जलाजलजलेचर ।
जलजामलपत्राक्ष यज्ञदेव हुताशन ॥१॥
कृष्णकेतो कृष्णवर्त्मन्स्वर्गमार्गप्रदर्शक ।
यज्ञाहुतिहुताहार यज्ञाहार हराकृते ॥२॥
पूर्णगर्भ गवां गर्भ जय देव महाशन ।
तमोहर महाहार स्वाहाभर्तर्नमोऽस्तु ते ॥३॥
हव्यवाहन सप्तार्चे चित्रभानो महायुते ।
अनलाग्ने यज्ञमुख जय पावक सर्वग ॥४॥
विभावसो महाभाग वेदभाषार्थभाषण ।
कृशानो ऋतुसम्भारप्रिय विश्वप्रभावन ॥५॥
सागराम्बुघृतं देव त्वमश्वमुखसंश्रितः ।
पिबंश्चैवोद्गिरंश्चैव न तृप्तिमधिगच्छसि ॥६॥
त्वं वाक्येष्वनुवाक्येषु निषत्सूपनिषत्सु च ।
ब्राह्मणा ब्रह्मयोनिं त्वां स्तुवन्ति त्वत्परायणाः ॥७॥
तुभ्यं कृत्वा नमो विप्राः स्वकर्मविहितां गतिम् ।
ब्रह्मेन्द्रविष्णुरुद्राणां लोकान्सम्प्राप्नुवन्ति च ॥८॥
त्वमन्तः सर्वभूतानां भुक्तं भोक्ता जगत्पते ।
पचसे पचतां श्रेष्ठ त्रीँल्लोकान्सङ्क्षयिष्यसि ॥९॥
साक्षी लोकत्रयस्यास्य त्वया तुल्यो न विद्यते ।
शरणं भव देवानां विश्वत्रयमहेश्वर ॥१०॥
इत्येवं स्तूयमानोऽसावुत्थाय ज्वलनस्तदा ।
देवान्प्रदक्षिणीकृत्य ययौ शम्भुगृहं द्विजाः ॥११॥
तत्रापश्यत्प्रतीहारं महादेवसमं बले ।
पूजितं सेन्द्रकैर्देवैर्महादेवदिदृक्षुभिः ॥१२॥
॥ इति सौरपुराणे एकषष्ठितमोऽध्यायान्तर्गता देवैः कृता अग्निस्तुतिः सम्पूर्णा ॥
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