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प्राण प्रतिष्ठा में शीशा टूटना – क्या चमत्कार है

प्राण प्रतिष्ठा में शीशा टूटना – क्या चमत्कार है ? शास्त्र क्या कहता है ?

प्राण प्रतिष्ठा विधि में एक क्रिया नेत्रोन्मीलन है। नेत्रोन्मीलन में एक परंपरा चल पड़ी है देवता के सामने शीशा/कांच रखने की और टूटने की। वैदिक विधि से प्राण प्रतिष्ठा में इसका क्या महत्व है हम इसे समझने का प्रयास करेंगे।

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शय्याधिवास – प्राण प्रतिष्ठा विधि

शय्याधिवास – प्राण प्रतिष्ठा विधि

धान्याधिवास के उपरांत क्रमशः जो भी अन्य अधिवास करना हो करके स्नपन करे।
स्नपन के बाद पुरुष सुक्तादि से स्तुति करे।
सजाया हुआ रथ तैयार करे इन मंत्रों से प्रतिमाओं को उठाये :

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नारायण सूक्त अर्थ सहित – शुक्ल यजुर्वेदोक्त

नारायण सूक्त अर्थ सहित – शुक्ल यजुर्वेदोक्त

नारायण सूक्त में ब्रह्मज्ञान विषयक गूढ़ार्थ सन्निहित है।
इसे पुरुष सूक्त का परभाग भी कहा जा सकता है।
यह ब्रह्म ज्ञान के महत्व को भी बताता है।
देवता ब्रह्मज्ञानियों के वश में होते हैं इसमें ऐसा भी बताया गया है।
इसमें परमात्मा के विषय में यह बताया गया है की वह सर्वव्यापी तो है ही अर्थात उसे बाहर भी देखा जा सकता है किन्तु वह सबके भीतर भी है और उसे भीतर भी पाया या जाना जा सकता है।
इसमें यह भी बताया गया है कि परमात्मा को जाने बिना कल्याण अर्थात मोक्ष का कोई अन्य उपाय नहीं है।

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पुरुष सूक्तं – सामवेदीय

पुरुष सूक्तं – सामवेदीय

प्रायः ऐसा देखा जाता है कि सामवेदीय सूक्तों के पाठ क्रम में शुक्ल यजुर्वेदी मात्र ᳪ (ग्गूं) का उच्चारण अनुस्वार कर देते हैं। परन्तु बात इतनी नहीं है; सामवेदीय सूक्तों में अन्य परिवर्तन भी होते हैं जो यहाँ दिये गये सामवेदीय पुरुष सूक्त से स्पष्ट हो जाता है।

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पुरुष सूक्तं – कृष्ण यजुर्वेदीय

पुरुष सूक्तं – कृष्ण यजुर्वेदीय

जहां शुक्लयजुर्वेद के पुरुषसूक्त में १६ ऋचायें मिलती है वहीं कृष्ण यजुर्वेद में १८ ऋचायें प्राप्त होती हैं।

कृष्ण यजुर्वेदियों को कृष्णयजुर्वेद के मंत्रों का ही उपयोग करना चाहिये।

सर्वत्र शुक्ल यजुर्वेद की ऋचायें इसलिये उपलब्ध होती है क्योंकि अधिकांश लोग शुक्ल यजुर्वेद के ही माध्यन्दिन शाखा का पालन करने वाले हैं।

किन्तु अन्य वेदों व शाखा वाले लोग भी हैं।

सबको अपने वेद व शाखा का ही पालन करना श्रेयस्कर कहा गया है।

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पितृ सूक्त

पितृ सूक्त

जिस तरह से विभिन्न देवताओं के सूक्त होते हैं उसी तरह पितरों के लिये भी विभिन्न वेदों में सूक्त हैं जिसे पितृसूक्त कहा जाता है। जिसमें से अन्य सभी सूक्तों की तरह ही शुक्ल यजुर्वेदोक्त पितृसूक्त ही मुख्य रूप से प्रयुक्त होता है।

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सरल रुद्राष्टाध्यायी – रुद्री पाठ संस्कृत

सरल रुद्राष्टाध्यायी – रुद्री पाठ संस्कृत : 8 Rudri

सरल रुद्राष्टाध्यायी – रुद्री पाठ संस्कृत : यहां संपूर्ण रुद्राष्टाध्यायी सरल करके प्रस्तुत किया गया है। लेकिन प्रायः ऐसा देखा गया है कि सरल करने के क्रम में विसंगतियां या असंगतियां उत्पन्न हो जाती है। यहां सरल पाठ के साथ-साथ त्रुटियों को दूर करके सर्वाधिक शुद्ध पाठ देने का प्रयास किया गया है, जिस कारण रुद्राभिषेक में यह विशेष उपयोगी हो जाता है।
इसके साथ ही एक और महत्वपूर्ण समस्या को दूर करने का भी प्रयास किया गया है। प्रायः मंत्रों के बीच में भी विज्ञापन आते हैं यहां इसका भी निवारण किया गया है।

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सर्प सूक्त स्तोत्र

सर्प सूक्त स्तोत्र

इस लेख में हम सर्प सूक्त के बारे में जानेंगे साथ ही शुद्ध सर्पसूक्त भी देखेंगे। सर्पों के लिये जो स्तुति हो उसे सर्प सूक्त कहते हैं। सर्प सूक्त पाठ करने के कई लाभ भी होते हैं।

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श्री सूक्त संस्कृत पाठ – सस्वर संपूर्ण

श्री सूक्त संस्कृत पाठ – सस्वर संपूर्ण

ऋग्वेद के पांचवें मंडल के अंत में माता लक्ष्मी का श्री सूक्त के १६ मंत्रों से होम किया जाता है। यहाँ सस्वर और स्वररहित दोनों प्रकार से श्री सूक्त दिया गया है। इससे धन, संपत्ति, ऐश्वर्य की वृद्धि होती है और दुःख-दरिद्रता का नाश होता है।

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रुद्र सूक्त – Rudra Suktam pdf, रुद्र सूक्त के लाभ

रुद्र सूक्त – Rudra Suktam pdf, रुद्र सूक्त के लाभ

यह आलेख शुक्ल यजुर्वेद के रुद्रसूक्त का महत्वपूर्ण वर्णन करता है। यह पूजा और हवन के लिए उपयुक्त है और दुःख, पाप, ताप का नाश करता है। इसमें रुद्र की स्तुति की गई है और इससे विशेष लाभ होता है। “शुक्ल यजुर्वेद अध्याय १६” के पीडीऍफ़ डाउनलोड के लिए भी लिंक दिया गया है।

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