मातृ षोडशी विधि – matru shodashi
मातृ आवाहन : करबद्ध होकर आवाहन करे – आगर्भज्ञानपर्यन्तं पालितो यत्त्वया ह्यहम् । आवाह्यामि त्वां मातर्दर्भपृष्ठे तिलोदकैः ॥
मातृ आवाहन : करबद्ध होकर आवाहन करे – आगर्भज्ञानपर्यन्तं पालितो यत्त्वया ह्यहम् । आवाह्यामि त्वां मातर्दर्भपृष्ठे तिलोदकैः ॥
तीर्थ श्राद्ध करने की विधि – तीर्थ श्राद्ध संकल्प : तदुत्तर त्रिकुशा, तिल, जल, द्रव्य आदि संकल्प द्रव्य लेकर संकल्प करे : ॐ अद्य …….. मासे …….. पक्षे …….. तिथौ …….. वासरे …….. गोत्रस्य …….. शर्माऽहं/(वर्माऽहं/गुप्तोऽहं)
भागवत सप्ताह विधि – संकल्प : ॐ अद्य ………. गोत्रस्य ……….. प्रेतस्य सद्गतिपूर्वक वैकुण्ठपदप्राप्तये ………. bhagwat saptah
नारायण बलि करने की विधि और मंत्र – narayan bali : दुर्मरण होने पर दुर्मरण शांति हेतु नारायणबलि श्राद्ध करने का विधान मिलता है। इस आलेख में नारायण बलि श्राद्ध करने की विधि और मंत्र दिये गये हैं।
श्राद्ध का भोजन करना चाहिए या नहीं – स्नानंसचैलं तिलमिश्रकर्म प्रेतानुयानं कलशप्रदानम् ॥ अपूर्वतीर्थामरदर्शनंच विवर्जयेन्मंगलतोब्दमेकम् ॥ – विवाहादि मङ्गल कार्य के वर्षमध्य में
पञ्चक शांति पूजन का तात्पर्य है पञ्चक में हुई मृत्यु दोष के शांति हेतु की जाने वाली पूजा-हवन विधि। यहां दी गयी सामग्री सूचि पञ्चक में हुयी मृत्यु के लिए की जाने वाली शांति विधि के लिये ही है।
अद्यैतस्य ………. मासे ……… पक्षे ……… तिथौ ……… वासरे ……… गोत्रोत्पन्नः ……… शर्माऽहं/(वर्माऽहं/गुप्तोऽहं) धनिष्ठादिपञ्चकनक्षत्रान्तर्गत ……….. नक्षत्राधिकरणक दुर्मरणजन्य दोष शान्त्यर्थं सर्वारिष्ट निरसन पूर्वक मम गृहे सर्वेषां बालादीनां दीर्घायुरारोग्यसुख प्राप्त्यर्थं पञ्चकमरणशान्तिमहं करिष्ये॥
जिन घरों में श्राद्ध सही विधि से नहीं किया जाता उनके पितर अतृप्त होकर कुपित हो जाते हैं। किसी भी प्रकार से यदि पितृ दोष ज्ञात हो तो त्रिपिंडी श्राद्ध करना चाहिये। जब प्रेत बाधा हो और किसी प्रकार से शांत न हो रही हो तो उस स्थिति में त्रिपिण्डी श्राद्ध करना चाहिये।
प्रेत बाधा से मुक्ति के उपाय में त्रिपिण्डी श्राद्ध का प्रमुख स्थान आता है। अज्ञात नामगोत्र वाले प्रेत के लिये अज्ञात नामगोत्र से सात्विक, राजसिक और तामसिक प्रेत कहकर बहुवचन में श्राद्ध किया जाता है।
विष्णुतर्पण करने के लिए ताम्बे/मिट्टी के पात्र में जल, दूध, तिल, जौ, तुलसी, सर्वोषधि, चन्दन, फूल, फल रखकर तर्पण जल बना ले। एक अन्य पात्र में शालिग्राम को रखे। सव्य-पूर्वाभिमुख दाहिने हाथ में शंख लेकर उसी जल से शालिग्राम पर जल गिराते हुये विष्णु-तर्पण करे। पहले पुरुषसूक्त की 16 ऋचाओं को पढ़कर प्रत्येक मन्त्र के अन्त में “विष्णुं तर्पयामि” कहकर जल दे ।